प्र1.
क्या आपने कभी अपने आस-पास कणों द्वारा प्रकाश का प्रकीर्णन देखा है? कुछ अन्य उदाहरण सोचिए!
उत्तर
हाँ — जहाँ भी कोई प्रकाश किरणपुंज निलंबित कणों वाली वायु अथवा द्रव से गुजरता है, उसका मार्ग दिखाई देने लगता है। यही टिंडल प्रभाव है।
- अंधेरे कक्ष में छोटे छिद्र अथवा पर्दे की झिरी से आती सूर्य-किरण, जिसे वायु की धूल उभार देती है।
- घने वृक्ष की पत्तियों के बीच से छनकर आता सूर्य का प्रकाश, अथवा प्रात:काल वन में धुंध में से गुजरता प्रकाश।
- खेल स्टेडियम की फ्लड लाइट्स के किरणपुंज (चित्र 5.24) तथा सिनेमा हॉल में प्रोजेक्टर के प्रकाश का शंकु।
- कोहरे वाली रात में वाहन की हेडलाइट, जिसका किरणपुंज दूर तक दिखाई देता है क्योंकि जल की बूँदें प्रकाश प्रकीर्णित करती हैं।
- जल में मिले दुग्ध अथवा तनु साबुन के विलयन के बीकर में से गुजारा गया लेसर अथवा टॉर्च का प्रकाश।
- आकाश का नीलापन और डूबते सूर्य की लालिमा — वायुमंडल के अणुओं तथा सूक्ष्म कणों द्वारा प्रकीर्णित सूर्य-प्रकाश।
किरणपुंज दिखाई क्यों देने लगता है: कोई वस्तु तभी दिखती है जब उससे आया प्रकाश आपकी आँख में प्रवेश करे। आपकी दृष्टि-रेखा के आर-पार जाता किरणपुंज आपकी ओर कुछ नहीं भेजता — जब तक कोई वस्तु उसका कुछ भाग पार्श्व में न मोड़ दे। निलंबित कण ठीक यही करते हैं: प्रत्येक कण किरणपुंज का थोड़ा भाग सभी दिशाओं में बिखेर देता है और उसका जो अंश आपकी आँख तक पहुँचता है वही किरणपुंज का मार्ग खींच देता है। स्वच्छ वायु और वास्तविक विलयनों में प्रकाश प्रकीर्णित करने योग्य कुछ भी बड़ा नहीं होता, इसलिए उनमें किरणपुंज अदृश्य ही रहता है।