प्र1.
शिकंजी के सभी संघटकों को एक बार मिलाने के पश्चात इन्हें पृथक करने की कल्पना कीजिए। क्या आप ऐसा कर सकते हैं?
उत्तर
पूरी तरह नहीं — और किसी एक विधि से तो निश्चित ही नहीं। शिकंजी में जल के साथ घुली चीनी, नमक, नींबू का रस उसके अम्लों तथा वर्णकों सहित, और प्रायः गूदे के कण तथा बर्फ होते हैं। आप कुछ घटक वापस पा सकते हैं, परंतु सभी को शुद्ध रूप में नहीं।
| घटक | जो विधि काम करेगी | कितनी अच्छी तरह |
|---|---|---|
| गूदा और बीज | निस्यंदन | सरलता से हट जाते हैं — ये निलंबन हैं |
| जल | आसवन | शुद्ध रूप में प्राप्त |
| चीनी और नमक एक साथ | वाष्पीकरण अथवा क्रिस्टलीकरण | प्राप्त तो होते हैं, परंतु आपस में मिले हुए |
| नींबू के रंगीन वर्णक | कागज वर्णलेखिकी | केवल अत्यल्प मात्रा में, उपयोग योग्य नहीं |
| चीनी को नमक से अलग करना | बार-बार प्रभाजी क्रिस्टलीकरण | अत्यंत कठिन — दोनों जल में घुलनशील हैं |
मिलाना पृथक करने से सरल क्यों है: पृथक्करण की प्रत्येक तकनीक किसी न किसी अंतर का उपयोग करती है — कणों के आकार में, विलेयता में, क्वथनांक में, घनत्व में, अथवा कागज पर चलने की गति में। जिस गुणधर्म पर कोई विधि टिकी है, यदि दो घटक उसमें समान हों तो वह विधि उन्हें अलग नहीं कर सकती। चीनी और नमक दोनों श्वेत हैं, दोनों जल में घुलनशील हैं और दोनों अवाष्पशील हैं, अतः छानना, आसवन अथवा वाष्पीकरण दोनों के साथ एक जैसा ही व्यवहार करते हैं। मिश्रण में जितने अधिक घटक होंगे, उतने ही अधिक अलग-अलग अंतर खोजने पड़ेंगे और तकनीकों की शृंखला उतनी ही लंबी होती जाएगी।
क्या आप जानते हैं? प्रकृति और उद्योग को यही कठिनाई कहीं बड़े पैमाने पर झेलनी पड़ती है — महासागरों से प्लास्टिक हटाना, पुरानी मोबाइल बैटरियों से लीथियम पुनः प्राप्त करना, अथवा वाहित मल को छोड़ने से पहले उपचारित करना। आपके अपने गुर्दे यह कार्य प्रति क्षण करते हैं — रक्त से अपशिष्ट पृथक करते हुए उपयोगी पदार्थ भीतर ही रखते हैं।