प्र1.
यदि कॉपर सल्फेट के गर्म संतृप्त विलयन को कक्ष के तापमान पर धीरे-धीरे ठंडा करने की अपेक्षा हिमशीतित जल में तीव्रता से ठंडा किया जाए तो निर्मित होने वाले क्रिस्टल छोटे होंगे तथा भली-भाँति निर्मित नहीं हो पाएँगे। इस परिकल्पना का परीक्षण करने के लिए आप किसी प्रयोग की अभिकल्पना एवं उसका निष्पादन किस प्रकार करेंगे?
उत्तर
ऐसा नियंत्रित प्रयोग अभिकल्पित कीजिए जिसमें केवल शीतलन की दर बदली जाए और शेष सब कुछ समान रखा जाए।
परीक्षण की जाने वाली परिकल्पना: कॉपर सल्फेट के संतृप्त विलयन को तीव्रता से ठंडा करने पर छोटे और कम सुरूपित क्रिस्टल बनते हैं।
चर
| प्रकार | इस प्रयोग में |
|---|---|
| स्वतंत्र चर (जिसे आप बदलते हैं) | शीतलन की दर — हिमशीतित जल-ऊष्मक बनाम कक्ष के तापमान की स्थिर वायु |
| आश्रित चर (जिसे आप मापते हैं) | बने हुए क्रिस्टलों का आकार तथा रूप |
| नियंत्रित चर (जो समान रखे जाते हैं) | एक ही विलयन, समान आयतन, समान प्रारंभिक तापमान, एक जैसे बीकर, दोनों समान समय तक स्थिर |
प्रक्रिया
- क्रियाकलाप 5.3 के अनुसार कॉपर सल्फेट का गर्म संतृप्त विलयन बनाइए और उसे गर्म अवस्था में ही निस्यंदित करके अघुलनशील अशुद्धियाँ हटा दीजिए।
- गर्म निस्यंद को दो समान भागों में बाँटकर दो एक-जैसे बीकरों में लीजिए और दोनों का प्रारंभिक तापमान तापमापी से नोट कीजिए।
- बीकर 1 को हिमशीतित जल के पात्र में रखिए। बीकर 2 को मेज पर कक्ष के तापमान पर रहने दीजिए। दोनों को वॉच ग्लास से ढक दीजिए और स्थिर रखिए।
- प्रत्येक बीकर का तापमान हर दो मिनट पर अभिलेखित कीजिए, जिससे दोनों शीतलन दरों का प्रमाण आपके पास रहे।
- समान निश्चित समय के पश्चात दोनों बीकरों के क्रिस्टलों को निस्यंदित कीजिए, ठंडे जल से धोइए और वॉच ग्लास पर सुखाइए।
- तुलना कीजिए: प्रत्येक बीकर के लगभग दस क्रिस्टलों की सबसे लंबी भुजा स्केल अथवा आवर्धक लेंस से मापिए और देखिए कि उनके फलक कितने तीक्ष्ण और नियमित हैं।
अपेक्षित परिणाम: बीकर 1 से अनेक छोटे क्रिस्टल मिलेंगे जिनके फलक खुरदरे और अनियमित होंगे; बीकर 2 से कम परंतु बड़े, चमकदार और स्पष्ट सपाट फलकों वाले क्रिस्टल मिलेंगे। यह परिकल्पना का समर्थन करता है।
ऐसा क्यों होता है: क्रिस्टल दो प्रतिस्पर्धी चरणों में बढ़ते हैं — नए केंद्र बनना और पहले से बने केंद्रों का बढ़ना। तीव्र शीतलन विलयन को एकाएक अत्यधिक अतिसंतृप्त कर देता है, अतः एक साथ बहुत बड़ी संख्या में केंद्र बन जाते हैं और सीमित विलेय उन सबमें बँट जाता है; इसलिए प्रत्येक छोटा रह जाता है। धीमा शीतलन अतिसंतृप्तता को मंद बनाए रखता है, अतः कम केंद्र बनते हैं और प्रत्येक को क्रमबद्ध रूप से कण जोड़ने का समय मिलता है, जिससे बड़े और सुरूपित क्रिस्टल बनते हैं।
संकेत: एक बार का प्रयोग प्रमाण नहीं होता। पूरी तुलना कम-से-कम तीन बार दोहराइए; यदि हर बार वही अंतर दिखे तो प्रमाण कहीं अधिक प्रबल हो जाता है। सुरक्षा सर्वोपरि: कॉपर सल्फेट विषालु है — इसे किसी वयस्क की देखरेख में ही प्रयोग कीजिए और नग्न हाथों से कभी स्पर्श न कीजिए।