| कथन | सत्य / असत्य | सही किया हुआ कथन |
|---|---|---|
| (i) नमक के विलयन से नमक को वाष्पीकरण अथवा आसवन द्वारा पृथक किया जा सकता है। | सत्य | — |
| (ii) आसवन का उपयोग उन दो द्रवों को पृथक करने में भी किया जा सकता है जिनके क्वथनांक समान हों। | असत्य | आसवन दो मिश्रणीय द्रवों को तभी पृथक कर सकता है जब उनके क्वथनांकों में कम-से-कम लगभग 25 °C का अंतर हो। |
| (iii) कागज वर्णलेखिकी में प्रयोग के आरंभ में विलायक का स्तर प्रतिदर्श बिंदु से ऊपर होना चाहिए। | असत्य | प्रयोग के आरंभ में विलायक का स्तर प्रतिदर्श बिंदु से नीचे होना चाहिए। |
| (iv) वाष्पीकरण और क्रिस्टलीकरण समान प्रक्रियाएँ हैं। | असत्य | ये भिन्न हैं: वाष्पीकरण में विलायक हटाकर विलेय पीछे छोड़ा जाता है, जबकि क्रिस्टलीकरण में संतृप्त विलयन से शुद्ध ठोस नियमित क्रिस्टलों के रूप में निक्षेपित होता है। |
(i) यह सत्य क्यों है। नमक एक अवाष्पशील ठोस है: इन तापमानों पर वह वाष्प नहीं बनता। अतः जल हटा देने पर — चाहे वाष्पित करके, चाहे उबालकर और आसवन उपकरण में संघनित करके — दोनों ही स्थितियों में नमक पात्र में शेष रह जाता है। आसवन इससे अधिक करता है: वह शुद्ध जल भी लौटा देता है।
(ii) यह असत्य क्यों है। आसवन इस बात पर निर्भर है कि एक द्रव दूसरे से पहले वाष्पित हो। यदि दोनों द्रव समान तापमान पर उबलें तो वे साथ-साथ वाष्पित होंगे और आसुत का संघटन मिश्रण जैसा ही रहेगा — कुछ पृथक नहीं होगा।
(iii) यह असत्य क्यों है। यदि विलायक का स्तर आरंभ में बिंदु से ऊपर हो तो स्याही धुलकर जार के विलायक में मिल जाएगी और नष्ट हो जाएगी। पूरी विधि इसी पर टिकी है कि विलायक कागज में से होकर ऊपर चढ़े और बिंदु तक नीचे से पहुँचे, अतः स्तर आरंभ में बिंदु से नीचे ही होना चाहिए।
(iv) यह असत्य क्यों है।
| बिंदु | वाष्पीकरण | क्रिस्टलीकरण |
|---|---|---|
| क्या हटाया जाता है | विलायक उड़ा दिया जाता है | विलायक रहता है; अतिरिक्त विलेय बाहर आता है |
| किससे चलता है | तापन अथवा वायु के संपर्क से | गर्म संतृप्त विलयन के धीमे शीतलन से |
| उत्पाद की शुद्धता | सभी घुली अशुद्धियाँ विलेय के साथ ही रह जाती हैं | अशुद्धियाँ द्रव में रह जाती हैं; क्रिस्टल शुद्ध होते हैं |
| ठोस का रूप | पपड़ी अथवा महीन चूर्ण | नियमित ज्यामिति वाले सुरूपित क्रिस्टल |