कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 7 अभ्यास प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
बताइए कि निम्नलिखित कथन सत्य हैं या असत्य— (i) कार्य तब होता है जब कोई बल लगाया जाता है भले ही वस्तु गति न करे। (ii) बाल्टी को ऊर्ध्वाधरतः ऊपर उठाने से बाल्टी पर धनात्मक कार्य होता है। (iii) कार्य और ऊर्जा दोनों का SI मात्रक जूल (J) है। (iv) एक स्थिर तनी हुई रबड़ की पट्टी में गतिज ऊर्जा होती है। (v) ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो सकती है।
उत्तर
क्रमकथनसत्य / असत्यकारण
(i)कार्य तब होता है जब बल लगाया जाए, भले ही वस्तु गति न करेअसत्यW = F × s। s = 0 होने पर कार्य शून्य है, चाहे आप कितना ही जोर लगाएँ (चित्र 7.5, दीवार धकेलना)।
(ii)बाल्टी को ऊर्ध्वाधरतः ऊपर उठाने पर उस पर धनात्मक कार्य होता हैसत्यआपका बल ऊपर की ओर है और विस्थापन भी ऊपर की ओर — एक ही दिशा, अतः W धनात्मक।
(iii)कार्य और ऊर्जा दोनों का SI मात्रक जूल (J) हैसत्यकिया गया कार्य ऊर्जा में परिवर्तन के रूप में प्रकट होता है, अतः मात्रक एक ही होना चाहिए। 1 J = 1 N m = 1 kg m² s⁻²।
(iv)स्थिर तनी हुई रबड़ की पट्टी में गतिज ऊर्जा होती हैअसत्यK = ½mv² और v = 0, अतः K = 0। उसमें विकृति के कारण प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा संचित है।
(v)ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो सकती हैसत्यबल्ब में विद्युत → प्रकाश, माँसपेशियों में रासायनिक → यांत्रिक, घंटी में यांत्रिक → ध्वनि (अनुभाग 7.3)।
(i) और (iv) में सावधानी: ये दोनों ही अध्याय के मुख्य भ्रम हैं। थकान कार्य नहीं है, और तना होना गति में होना नहीं है। कार्य की कसौटी सदैव बल की दिशा में विस्थापन है; गतिज ऊर्जा की कसौटी सदैव चाल है।
प्र2.
रिक्त स्थान भरिए— (i) किया गया कार्य = ______ × ______ (बल की दिशा में)। (ii) किसी वस्तु पर ______ न्यूटन बल लगाने से वस्तु 1 m विस्थापित होती है तो 1 जूल कार्य संपन्न होता है। (iii) m द्रव्यमान और v वेग वाले पिंड की गतिज ऊर्जा का व्यंजक ______ होगा। (iv) पृथ्वी की सतह से h ऊँचाई पर स्थित m द्रव्यमान की वस्तु की स्थितिज ऊर्जा ______ होती है। (v) कार्य करने की ______ को शक्ति कहते हैं।
उत्तर
क्रमउत्तरकहाँ से
(i)बल × विस्थापनसमीकरण 7.1 / 7.2: W = F × s
(ii)11 J = 1 N × 1 m, पृष्ठ 118
(iii)½mv²समीकरण 7.6
(iv)mghसमीकरण 7.8
(v)दरसमीकरण 7.11: P = W/t
प्रत्येक सूत्र के मात्रक जाँचिए—
W = F × s → N × m = J
K = ½mv² → kg × (m s–1)2 = kg m2 s–2 = J
U = mgh → kg × m s–2 × m = kg m2 s–2 = J
P = W/t → J ÷ s = W (वाट)
ध्यान दीजिए: ऊर्जा के तीनों सूत्रों को घटाकर kg m² s⁻² ही आना चाहिए। यदि आपके लिखे सूत्र से यह न आए तो वह गलत है — परीक्षा में यह सबसे तेज जाँच है।
प्र3.
जब ऊपर की ओर फेंकी गई गेंद अपने उच्चतम बिंदु पर पहुँचती है तो निम्नलिखित में से कौन-सा/ से कथन सही है/हैं? (i) गेंद पर लगने वाला बल शून्य है। (ii) गेंद का त्वरण शून्य है। (iii) इसकी गतिज ऊर्जा शून्य है। (iv) इसकी स्थितिज ऊर्जा अधिकतम है।
उत्तर

सही कथन हैं (iii) तथा (iv)

क्रमकथनसही?कारण
(i)गेंद पर लगने वाला बल शून्य हैनहींगुरुत्व कभी बंद नहीं होता। उच्चतम बिंदु पर भी भार mg नीचे की ओर लग रहा है।
(ii)गेंद का त्वरण शून्य हैनहींa = F/m = mg/m = g = 10 m s⁻², नीचे की ओर — उस क्षण भी जब v = 0 है।
(iii)इसकी गतिज ऊर्जा शून्य हैहाँउच्चतम बिंदु पर v = 0, अतः K = ½mv² = 0।
(iv)इसकी स्थितिज ऊर्जा अधिकतम हैहाँवहीं h सबसे अधिक है, अतः U = mgh सबसे अधिक।
पूरी उड़ान में यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित रहती है:
फेंकते समय: K = ½mu2, U = 0
उच्चतम बिंदु पर: K = 0, U = mghmax
बराबर करने पर: mghmax = ½mu2hmax = u2 ÷ 2g
(i) और (ii) में विद्यार्थी क्यों फँसते हैं: शून्य वेग को शून्य त्वरण मान लिया जाता है। वेग गेंद की चाल है; त्वरण यह है कि वह चाल कितनी तेजी से बदल रही है। उच्चतम बिंदु पर वेग ऊपर से नीचे जाते हुए शून्य से गुजर रहा है, और वह पहले जितनी ही तेजी से बदल रहा है — प्रति सेकंड 10 m s⁻¹ की दर से।
प्र4.
निम्नलिखित में से प्रत्येक स्थिति में होने वाले ऊर्जा रूपांतरण की पहचान कीजिए। (i) एक ट्रक का पहाड़ी पर ऊपर की ओर चढ़ना (ii) घड़ी की स्प्रिंग का खुलना (iii) हरे पत्तों द्वारा प्रकाश संश्लेषण (iv) बाँध से बहता हुआ जल (v) माचिस की तीली का जलना (vi) एक पटाखे में विस्फोट होना (vii) माइक्रोफोन में बोलना (viii) एक दीप्त विद्युत बल्ब (ix) सौर-पैनल
उत्तर
क्रमस्थितिऊर्जा रूपांतरणवास्तव में क्या होता है
(i)ट्रक का पहाड़ी पर चढ़नारासायनिक → गतिज + गुरुत्वीय स्थितिज (+ तापीय)डीजल जलता है; इंजन पहिए चलाता है और ट्रक ऊँचाई भी प्राप्त करता है, अतः mgh मिलता है। शेष घर्षण व गर्म निकास में चला जाता है।
(ii)घड़ी की स्प्रिंग का खुलनाप्रत्यास्थ स्थितिज → यांत्रिक (गतिज)लपेटी हुई स्प्रिंग विकृत होकर ऊर्जा संचित करती है; खुलते समय वह गियर और सुइयाँ घुमाती है।
(iii)हरे पत्तों द्वारा प्रकाश संश्लेषणप्रकाश (सौर) → रासायनिकपर्णहरित द्वारा अवशोषित सूर्य का प्रकाश ग्लूकोस के बंधों में संचित हो जाता है — यही आहार शृंखला का ऊर्जा भंडार है।
(iv)बाँध से बहता हुआ जलगुरुत्वीय स्थितिज → गतिज (→ टरबाइन में विद्युत)जलाशय में ऊँचाई पर रखे जल में mgh है; गिरने पर वह ½mv² बन जाती है और टरबाइन घुमाती है।
(v)माचिस की तीली का जलनारासायनिक → तापीय + प्रकाशतीली के सिरे के रसायन अभिक्रिया करके संचित बंध ऊर्जा ऊष्मा और लौ के रूप में मुक्त करते हैं।
(vi)पटाखे में विस्फोटरासायनिक → तापीय + प्रकाश + ध्वनि + गतिजअत्यंत तीव्र अभिक्रिया; गर्म गैसें बाहर की ओर धकेलती हैं, अतः टुकड़ों और वायु को गतिज ऊर्जा भी मिलती है।
(vii)माइक्रोफोन में बोलनाध्वनि → विद्युतवायु के कंपन एक झिल्ली को कंपित करते हैं और कंपित झिल्ली उसी के अनुरूप विद्युत संकेत उत्पन्न करती है।
(viii)दीप्त विद्युत बल्बविद्युत → प्रकाश + तापीयधारा तंतु को इतना गर्म कर देती है कि वह चमकने लगता है। तंतु वाले बल्ब में अधिकांश ऊर्जा प्रकाश नहीं, ऊष्मा बनकर निकलती है।
(ix)सौर-पैनलप्रकाश (सौर) → विद्युतप्रकाश-सेल सूर्य के प्रकाश को सीधे विद्युत धारा में बदल देते हैं।
ध्यान देने योग्य पैटर्न: प्रत्येक स्थिति में कुल ऊर्जा पहले और बाद में समान रहती है — केवल नाम बदलता है। और लगभग हर स्थिति में कुछ भाग तापीय ऊर्जा बन जाता है, जिसका पुनः उपयोग सबसे कठिन होता है।
प्र5.
एक विद्यार्थी को एक लिफ्ट द्वारा धीरे-धीरे भूतल से भवन के सबसे ऊपरी तल तक ले जाया जाता है, तत्पश्चात वही विद्यार्थी सीढ़ियों से चढ़कर सबसे ऊपरी तल तक पहुँचता है। यदि भवन की ऊँचाई h = 72.5 m, गुरुत्वीय त्वरण g = 10 m s–2 और विद्यार्थी का द्रव्यमान m = 50 kg है तो— (i) यदि विद्यार्थी को लिफ्ट द्वारा सीधे सबसे ऊपरी तल तक ले जाया जाता है तो उसकी स्थितिज ऊर्जा में हुई वृद्धि ज्ञात कीजिए। (ii) जब विद्यार्थी सीढ़ियों से चढ़कर सबसे ऊपरी तल पर पहुँचता है तो उसकी स्थितिज ऊर्जा में वृद्धि ज्ञात कीजिए। (iii) आप तय किए रास्ते पर स्थितिज ऊर्जा की निर्भरता के संबंध में क्या निष्कर्ष निकालेंगे?
उत्तर

(i) 36 250 J। (ii) 36 250 J — बिल्कुल उतनी ही। (iii) गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा केवल प्राप्त ऊँचाई पर निर्भर करती है, तय किए गए रास्ते पर नहीं।

(i) लिफ्ट द्वारा
सूत्र: ΔU = mgh
ΔU = 50 kg × 10 m s–2 × 72.5 m
ΔU = 36 250 J = 3.625 × 104 J (लगभग 36.25 kJ)

(ii) सीढ़ियों द्वारा
आरंभिक और अंतिम ऊँचाई वही हैं, अतः h अब भी 72.5 m है
ΔU = 50 kg × 10 m s–2 × 72.5 m = 36 250 Jकोई अंतर नहीं

(iii) निष्कर्ष: किसी वस्तु की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा केवल चुने गए संदर्भ तल से उसकी ऊर्ध्वाधर ऊँचाई पर निर्भर करती है। वह रास्ते पर निर्भर नहीं करती — सीधे ऊपर, सीढ़ियों से, घुमावदार ढलान से या पहाड़ी सड़क से — सभी में mgh समान ही रहता है।

ऐसा क्यों होता है: गुरुत्व ऊर्ध्वाधर नीचे की ओर कार्य करता है। सीढ़ी के क्षैतिज भागों — पायदानों — पर विस्थापन गुरुत्व के लंबवत होता है, अतः वहाँ गुरुत्व कोई कार्य नहीं करता और कुछ संचित नहीं होता। केवल ऊर्ध्वाधर भाग गिने जाते हैं और उन सबका योग ठीक 72.5 m है।
फिर अंतर क्या है: सीढ़ियों पर विद्यार्थी कहीं अधिक थक जाता है। ऐसा इसलिए कि पैर की माँसपेशियाँ शरीर को आगे-पीछे ले जाने में भी कार्य करती हैं और शरीर के भीतर ऊष्मा के रूप में ऊर्जा खोती हैं। पृथ्वी-विद्यार्थी निकाय में संचित ऊर्जा दोनों स्थितियों में 36 250 J ही रहती है।
प्र6.
एक क्रेन m द्रव्यमान को एक निश्चित समय में किसी भवन के 10वें तल तक उठाती है। इसके पश्चात यह उसी द्रव्यमान को उसी भवन के 20वें तल तक दोगुने समय में उठाती है। इसके लिए उसे कितनी और अधिक ऊर्जा एवं शक्ति चाहिए? यह मान लीजिए कि सभी तलों की ऊँचाई समान है।
उत्तर

ऊर्जा दोगुनी चाहिए — अर्थात 100 % अधिक। शक्ति ठीक उतनी ही चाहिए — बिल्कुल भी अधिक नहीं।

मान लीजिए एक तल की ऊँचाई h0 है और पहली बार में t समय लगता है।

पहली बार — 10वें तल तक
ऊँचाई = 10h0
E1 = mg × 10h0
P1 = E1 ÷ t = 10mgh0 ÷ t

दूसरी बार — 20वें तल तक, 2t समय में
ऊँचाई = 20h0
E2 = mg × 20h0 = 2E1
P2 = E2 ÷ (2t) = 20mgh0 ÷ 2t = 10mgh0 ÷ t = P1

अतिरिक्त आवश्यक ऊर्जा = E2 – E1 = 10mgh0, अर्थात 100 % अधिक
अतिरिक्त आवश्यक शक्ति = P2 – P1 = 0 W
शक्ति क्यों नहीं बदलती: शक्ति प्रति एकांक समय किया गया कार्य है। ऊँचाई दोगुनी करने से कार्य दोगुना होता है, किंतु समय भी दोगुना होने से वह कार्य दोगुने अंतराल पर फैल जाता है। दोनों 2 के गुणक कट जाते हैं, अतः क्रेन की मोटर ठीक उसी दर से कार्य कर रही है — बस अधिक देर तक।
स्वयं जाँचिए: संख्याएँ रखिए। m = 500 kg, h₀ = 3 m, g = 10 m s⁻², t = 30 s लीजिए। तब E₁ = 500 × 10 × 30 = 1,50,000 J और P₁ = 5000 W। तथा E₂ = 500 × 10 × 60 = 3,00,000 J और P₂ = 3,00,000 ÷ 60 = 5000 W। शक्ति समान।
प्र7.
घिरनी की सहायता से किसी झंडे को भूमि से एक ऊँचे ध्वजदंड के शीर्ष तक उठाने के लिए आवश्यक ऊर्जा किन कारकों पर निर्भर करती है? क्या झंडे को धीरे-धीरे या शीघ्रता से ऊपर उठाने पर किए गए कार्य के परिमाण में अंतर होगा? यदि झंडे को उठाने की गति दोगुनी कर दी जाए तो शक्ति की आवश्यकता किस प्रकार परिवर्तित होगी? अपने उत्तरों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर

ऊर्जा झंडे के द्रव्यमान, ध्वजदंड की ऊँचाई तथा g पर निर्भर करती है। गति से किए गए कार्य में कोई अंतर नहीं पड़ता। गति दोगुनी करने पर आवश्यक शक्ति दोगुनी हो जाती है।

ऊर्जा किन कारकों पर निर्भर है
E = mgh, अतः निर्भर है—
• m — झंडे का (तथा साथ उठने वाली रस्सी का) द्रव्यमान
• h — ध्वजदंड की ऊँचाई
• g — गुरुत्वीय त्वरण
स्थिर घिरनी का यांत्रिक लाभ 1 होता है; वह केवल आपके नीचे की ओर खिंचाव को ऊपर की ओर उठाव में बदलती है, न बल बदलती है न ऊर्जा।

धीरे या शीघ्र?
W = mgh में t है ही नहीं। दोनों स्थितियों में किया गया कार्य समान है।

गति दोगुनी करने पर
P = W ÷ t। गति दोगुनी होने पर समय आधा: t′ = t/2
P′ = W ÷ (t/2) = 2W ÷ t = 2P — शक्ति की आवश्यकता दोगुनी

संख्याओं से स्पष्ट कीजिए। 0.5 kg का झंडा, 10 m ऊँचा दंड, g = 10 m s–2

किस प्रकार उठाया गयाकिया गया कार्यसमयशक्ति
धीरे, 0.5 m s⁻¹ से0.5 × 10 × 10 = 50 J20 s2.5 W
दोगुनी गति से, 1 m s⁻¹50 J — अपरिवर्तित10 s5 W — दोगुनी
यहाँ कार्य और शक्ति अलग क्यों हो जाते हैं: कार्य बताता है कितनी ऊर्जा स्थानांतरित हुई; शक्ति बताती है कितनी तेजी से। झंडा दोनों स्थितियों में उसी ऊँचाई पर उतनी ही स्थितिज ऊर्जा के साथ पहुँचता है — वही कार्य है। किंतु रस्सी खींचने वाले व्यक्ति या मोटर को वही ऊर्जा आधे समय में देनी पड़ती है, और यह माँसपेशियों या मोटर पर भारी माँग है।
प्र8.
60 kg द्रव्यमान का कोई व्यक्ति 100 kg के स्कूटर पर सवारी करता है, वह स्कूटर को v वेग तक त्वरित करता है। दूसरे दिन उसका 40 kg द्रव्यमान का पुत्र उसके साथ यात्री के रूप में बैठता है, यदि उक्त दोनों दिनों में स्कूटर समान समय में समान चाल प्राप्त करता है। तो बताइए दोनों दिनों में उपयोग किए गए ईंधन का अनुपात कितना होगा? यह मान लीजिए कि स्कूटर में ऊर्जा का स्थानांतरण पूर्णतया ईंधन के कारण होता है और वायु प्रतिरोध या घर्षण के कारण कोई अन्य हानि नहीं होती है।
उत्तर

पहले दिन और दूसरे दिन प्रयुक्त ईंधन का अनुपात 4 : 5 होगा।

पहला दिन — व्यक्ति + स्कूटर
कुल द्रव्यमान M1 = 60 kg + 100 kg = 160 kg
विरामावस्था से आरंभ, अंतिम चाल v:
E1 = ½M1v2 = ½ × 160 kg × v2 = 80v2 जूल (v, m s–1 में)

दूसरा दिन — व्यक्ति + पुत्र + स्कूटर
कुल द्रव्यमान M2 = 60 kg + 40 kg + 100 kg = 200 kg
E2 = ½M2v2 = ½ × 200 kg × v2 = 100v2 जूल

ईंधन का अनुपात (सारी ऊर्जा ईंधन से आती है और कोई अन्य हानि नहीं)
E1 : E2 = 80v2 : 100v2 = 80 : 100 = 4 : 5
समय अंतराल का इसमें कोई योगदान क्यों नहीं: ईंधन ऊर्जा देता है, और आवश्यक ऊर्जा ½Mv² से तय है। समय केवल इंजन की शक्ति तय करता है, कुल जलने वाला ईंधन नहीं। चूँकि दोनों दिन समय समान है, शक्तियों का अनुपात भी वही 4 : 5 रहेगा।
ध्यान दीजिए: बहुत सामान्य भूल यह है कि 60 kg की तुलना 100 kg से या 60 + 40 = 100 kg से कर ली जाए। इंजन को पूरे गतिमान निकाय को त्वरित करना पड़ता है, अतः स्कूटर का अपना 100 kg दोनों दिन गिनना ही चाहिए।
प्र9.
सरकने वाली कुर्सियों वाले सी-सॉ प्रकार के एक झूले पर एक तरफ एक बच्चा बैठा है और दूसरी ओर एक वयस्क। वयस्क का भार बच्चे के भार से दोगुना है। इसके पश्चात भी सी-सॉ संतुलित है। ऐसी स्थिति को दर्शाता हुआ एक चित्र बनाइए जिसमें आलंब से बच्चे और वयस्क की दूरी दर्शाई गई हों।
उत्तर

संतुलन के लिए बच्चे को आलंब से वयस्क की तुलना में दोगुनी दूरी पर बैठना होगा। यदि वयस्क d दूरी पर बैठे तो बच्चा 2d दूरी पर बैठेगा।

आलंब बच्चा, भार W वयस्क, भार 2W 2d d W × 2d = 2W × d — झूला संतुलित रहता है
सी-सॉ प्रथम श्रेणी का उत्तोलक है। हल्का बच्चा आलंब से उतनी ही दोगुनी दूरी पर बैठता है जितना वयस्क का भार दोगुना है।
उत्तोलक की संतुलन शर्त (समीकरण 7.15):
आयास × आयास भुजा = भार × भार भुजा
मान लीजिए बच्चे का भार W और वयस्क का 2W है।
W × dबच्चा = 2W × dवयस्क
W कट जाता है: dबच्चा = 2 × dवयस्क

अतः यदि वयस्क आलंब से 1 m दूर बैठे तो बच्चे को 2 m दूर बैठना होगा।
जाँच: 300 N × 2 m = 600 N m तथा 600 N × 1 m = 600 N m  ✔
यह क्यों काम करता है: सी-सॉ को संतुलित केवल भार नहीं करता, बल्कि भार × आलंब से दूरी का गुणनफल — अर्थात घूर्णन प्रभाव — करता है। आधा भारी होने की भरपाई ठीक-ठीक दोगुनी दूरी पर बैठकर हो जाती है।
यह करके देखिए: उदाहरण 7.13 (चित्र 7.34) के झूले में AC = EC = 2 m और BC = DC = 1 m है; वहाँ कुर्सी A पर बैठा 15 kg का बच्चा कुर्सी D पर बैठे 30 kg के बच्चे को संतुलित करता है — यही 2 : 1 का नियम।
प्र10.
एक गेंद को 20 m s–1 की गति से ऊपर की ओर फेंका जाता है। (i) गेंद की ऊपर की ओर गति और नीचे की ओर गति के समय इस पर गुरुत्व के अधीन किए गए कार्य के चिह्न की पहचान कीजिए। (ii) यदि गेंद 19.4 m की ऊँचाई तक पहुँचती है तो वायु प्रतिरोध द्वारा कितना कार्य किया जाता है? (मान लीजिए g = 10 m s–2)
उत्तर

(i) ऊपर जाते समय ऋणात्मक, नीचे आते समय धनात्मक। (ii) ऊपर चढ़ते समय वायु प्रतिरोध ने गेंद पर –12 J कार्य किया।

ध्यान दीजिए: हिंदी संस्करण में गेंद का द्रव्यमान छपने से रह गया है। अंग्रेजी संस्करण के अनुसार यह 2 kg है, और नीचे की गणना उसी मान से की गई है।
(i) गुरुत्व द्वारा किए गए कार्य का चिह्न
गुरुत्व सदैव नीचे की ओर कार्य करता है।
ऊपर जाते समय: विस्थापन ऊपर, बल के विपरीत → ऋणात्मक कार्य (गेंद धीमी होती है और गतिज ऊर्जा खोती है)
नीचे आते समय: विस्थापन नीचे, बल की दिशा में → धनात्मक कार्य (गेंद तेज होती है और गतिज ऊर्जा पाती है)
(ii) चढ़ाई में वायु प्रतिरोध द्वारा किया गया कार्य
m = 2 kg, u = 20 m s–1, h = 19.4 m, g = 10 m s–2

फेंकते समय गतिज ऊर्जा:
Ki = ½mu2 = ½ × 2 kg × (20 m s–1)2 = 400 J
उच्चतम बिंदु पर गतिज ऊर्जा: Kf = 0 J (गेंद क्षण भर के लिए रुक जाती है)

चढ़ाई में गुरुत्व द्वारा किया गया कार्य:
Wगुरुत्व = –mgh = –(2 kg × 10 m s–2 × 19.4 m) = –388 J

पूरी चढ़ाई पर कार्य-ऊर्जा प्रमेय:
Wगुरुत्व + Wवायु = Kf – Ki
(–388 J) + Wवायु = 0 J – 400 J = –400 J
Wवायु = –400 J + 388 J = –12 J
उत्तर ऋणात्मक क्यों और इतना छोटा क्यों: वायु प्रतिरोध प्रत्येक क्षण गति का विरोध करता है, अतः उसका कार्य ऋणात्मक ही होना चाहिए — वह ऊर्जा लेता है, देता नहीं। ये 12 J ठीक वही ऊर्जा है जो ऊष्मा और घूमती हवा के रूप में गेंद से निकल गई। परिणाम देखिए: वायु न होती तो गेंद u²/2g = 400 ÷ 20 = 20 m तक जाती। इन्हीं 12 J की हानि से अंतिम 0.6 m छूट गया।
स्वयं जाँचिए: 12 J ÷ (mg) = 12 J ÷ 20 N = 0.6 m — ठीक उतनी ही ऊँचाई की कमी। ऊर्जा का हिसाब पूरी तरह मिल जाता है।
प्र11.
एक 10.0 kg का गुटका नगण्य घर्षण वाले क्षैतिज फर्श पर गतिमान है। चित्र 7.37 में दर्शाए अनुसार गुटके पर उसकी गति की दिशा में 0 m से 4 m तक के विस्थापन के समय अंतराल में एक परिवर्ती बल (variable force) लगाया जाता है। यदि गुटके की 0 m की स्थिति पर गतिज ऊर्जा 180 J थी तो गुटके की चाल ज्ञात कीजिए। (i) 0 m पर और (ii) 4 m पर। क्या गुटके की गति के किसी भाग में गुटके का त्वरण ऋणात्मक है?
उत्तर

(i) 0 m पर 6 m s⁻¹। (ii) 4 m पर लगभग 8.12 m s⁻¹। नहीं — त्वरण कभी ऋणात्मक नहीं होता, यद्यपि 3 m से 4 m के बीच वह घटता अवश्य है।

50 0 1 2 3 4 विस्थापन (m) बल (N) छायांकित क्षेत्रफल = कार्य = 150 J
परिवर्ती बल द्वारा किया गया कार्य चित्र 7.37 के बल-विस्थापन ग्राफ के नीचे बने समलंब का क्षेत्रफल है।
(i) 0 m पर चाल
K = ½mv2 → v = √(2K ÷ m)
v = √(2 × 180 J ÷ 10.0 kg) = √(36 m2 s–2) = 6 m s–1

0 m से 4 m तक बल द्वारा किया गया कार्य = ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल
आकृति समलंब है: समांतर भुजाएँ 4 m (नीचे) तथा 2 m (ऊपर का सपाट भाग, 1 m से 3 m), ऊँचाई 50 N।
W = ½ × (4 m + 2 m) × 50 N = ½ × 6 m × 50 N = 150 J
खंडों से जाँच: ½(1 m)(50 N) + (2 m)(50 N) + ½(1 m)(50 N) = 25 + 100 + 25 = 150 J  ✔

(ii) 4 m पर चाल — कार्य-ऊर्जा प्रमेय से
4 m पर K = 0 m पर K + किया गया कार्य = 180 J + 150 J = 330 J
v = √(2 × 330 J ÷ 10.0 kg) = √(66 m2 s–2) = 8.12 m s–1

क्या त्वरण कहीं ऋणात्मक है? नहीं।

a = F ÷ m, और ग्राफ दर्शाता है कि 0 m से 4 m तक हर बिंदु पर F धनात्मक (गति की दिशा में) है।
0 से 1 m: F 0 → 50 N बढ़ता है, अतः a 0 → 5 m s–2 बढ़ता है
1 से 3 m: F = 50 N, अतः a = 50 N ÷ 10.0 kg = 5 m s–2, नियत
3 से 4 m: F 50 N → 0 घटता है, अतः a 5 m s–2 → 0 घटता है — कम, किंतु फिर भी धनात्मक
यहाँ जो अंतर समझना आवश्यक है: घटता हुआ बल पीछे की ओर लगने वाला बल नहीं होता। 3 m से 4 m के बीच भी गुटके को आगे ही धकेला जा रहा है, अतः उसकी चाल बढ़ती ही रहती है — बस कम तेजी से। त्वरण तभी ऋणात्मक होता जब ग्राफ अक्ष से नीचे चला जाता, और वह कभी नहीं जाता।
प्र12.
चंद्रमा की सतह (चंद्रतल) पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की सतह के गुरुत्वाकर्षण का लगभग 1/6 भाग है। एक अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी की सतह से किसी गेंद को 8 m की ऊँचाई तक फेंक सकता है। यदि उसी गेंद को उतने ही ऊर्ध्व वेग से चंद्रमा की सतह से ऊपर की ओर फेंका जाए तो गेंद चंद्रमा की सतह पर कितनी ऊँचाई तक जाएगी?
उत्तर

गेंद चंद्रमा पर 48 m तक जाएगी — छह गुनी ऊँचाई।

अंतरिक्ष यात्री दोनों बार समान चाल u से फेंकता है, अतः गेंद की आरंभिक गतिज ऊर्जा भी समान है।
उच्चतम बिंदु पर वह पूरी स्थितिज ऊर्जा बन जाती है:
½mu2 = mgh  →  h = u2 ÷ 2g

पृथ्वी पर
hपृ = u2 ÷ (2gपृ) = 8 m

चंद्रमा पर, gचं = gपृ ÷ 6
hचं = u2 ÷ (2gचं) = u2 ÷ (2 × gपृ/6) = 6 × u2 ÷ (2gपृ) = 6 hपृ
hचं = 6 × 8 m = 48 m

संख्याओं से, gपृ = 10 m s–2 लेकर—

u = √(2gपृhपृ) = √(2 × 10 × 8) = √160 ≈ 12.6 m s–1
gचं = 10 ÷ 6 ≈ 1.67 m s–2
hचं = u2 ÷ (2gचं) = 160 ÷ (2 × 1.67) = 48 m  ✔
ऐसा क्यों होता है: एक ही प्रकार से फेंकने पर गेंद को समान गतिज ऊर्जा ½mu² मिलती है। चंद्रमा पर प्रत्येक मीटर की चढ़ाई में केवल mgचंh अर्थात छठा भाग स्थितिज ऊर्जा लगती है, अतः उतनी ही ऊर्जा से छह गुनी ऊँचाई मिल जाती है। ध्यान दीजिए, गेंद का द्रव्यमान कहीं आता ही नहीं — वह दोनों ओर से कट जाता है।
क्या आप जानते हैं? इसी कारण चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्री लंबी, धीमी छलाँगें लगाते हुए चलते थे। पैरों का वही धक्का उन्हें छह गुना ऊपर उठा देता था।
प्र13.
एक 1000 kg द्रव्यमान की एक कार सड़क पर नियत चाल से गतिमान है। अचानक चालक को आगे कोई बाधा दिखाई देती है। वह कार को पूरी तरह रोकने के लिए ब्रेक लगाता है। चालक द्वारा आगे बाधा को देखने के क्षण से कार की गति का आलेखी निरूपण चित्र 7.38 में दर्शाया गया है। (i) बताइए कि स्थिति A और B के बीच कार की गति किस प्रकार की है? (ii) स्थिति A पर कार की गतिज ऊर्जा का परिकलन कीजिए। (iii) बताइए कि B और C के बीच कार को रोकने के लिए ब्रेक द्वारा कितना कार्य करना होगा? (iv) कार की गतिज ऊर्जा किस ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है?
उत्तर
A B C 35 0 1 2 3 समय (s) चाल (m s⁻¹) क्षेत्रफल = तय की गई दूरी
A से B: एक सेकंड तक नियत चाल — चालक का प्रतिक्रिया काल। B से C: दो सेकंड में एकसमान मंदन से विराम।

(i) A और B के बीच कार सरल रेखा में 35 m s–1 की नियत चाल से चलती है।

ग्राफ t = 0 s से t = 1 s तक क्षैतिज है, अतः चाल नहीं बदलती।
त्वरण = 0, अतः कार पर नेट बल शून्य है — ब्रेक अभी लगाए ही नहीं गए
यह एक सेकंड चालक का प्रतिक्रिया काल है — बाधा देखने और पैडल दबाने के बीच का समय।
इस बीच तय दूरी = 35 m s–1 × 1 s = 35 m, अर्थात ब्रेक लगने से पहले ही इतनी दूरी निकल जाती है।
(ii) A पर गतिज ऊर्जा
K = ½mv2
K = ½ × 1000 kg × (35 m s–1)2
K = 500 kg × 1225 m2 s–2
K = 6,12,500 J = 6.125 × 105 J
(iii) B से C तक ब्रेक द्वारा किया गया कार्य
B पर कार के पास अब भी 6,12,500 J है (चाल 35 m s–1 ही है)।
C पर कार विरामावस्था में है: K = 0 J।
कार्य-ऊर्जा प्रमेय: किया गया कार्य = गतिज ऊर्जा में परिवर्तन
W = 0 J – 6,12,500 J = –6,12,500 J
ऋणात्मक चिह्न दर्शाता है कि ब्रेक का बल गति का विरोध करता है।

प्रति-जाँच: ब्रेक लगने के बाद तय दूरी = त्रिभुज का क्षेत्रफल = ½ × 2 s × 35 m s–1 = 35 m
ब्रेक बल = 6,12,500 J ÷ 35 m = 17,500 N
और न्यूटन के द्वितीय नियम से: a = (0 – 35) ÷ 2 = –17.5 m s–2, F = 1000 × 17.5 = 17,500 N  ✔

(iv) गतिज ऊर्जा मुख्यतः तापीय ऊर्जा में बदल जाती है — ब्रेक पैड व डिस्क, टायरों तथा सड़क की सतह में ऊष्मा — और साथ में थोड़ी ध्वनि ऊर्जा (टायरों की चरचराहट)।

सड़क पर इसका महत्त्व: कुल रुकने की दूरी 35 m प्रतिक्रिया + 35 m ब्रेक = कुल 70 m है। और चूँकि K, v² के अनुपात में है, 70 m s⁻¹ पर चलती कार से चार गुनी ऊर्जा हटानी पड़ती, अतः ब्रेक की दूरी भी लगभग चार गुनी हो जाती।
प्र14.
एक घर्षण रहित (frictionless) पथ पर गतिमान 0.5 kg गेंद का स्थितिज ऊर्जा-विस्थापन ग्राफ चित्र 7.39 में दर्शाया गया है। बिंदु O पर गेंद का वेग 0 m s–1 और स्थितिज ऊर्जा 30 J है। P, Q और R पर बल के वेग की गणना कीजिए।
उत्तर

P पर गेंद लगभग 6.3 m s⁻¹ से गतिमान है, Q पर वह क्षण भर के लिए विरामावस्था में है (0 m s⁻¹), और R तक वह कभी पहुँच ही नहीं सकती।

ध्यान दीजिए: हिंदी संस्करण में "बल के वेग" छपा है; यहाँ आशय गेंद के वेग से है, जैसा अंग्रेजी संस्करण में है।
कुल यांत्रिक ऊर्जा = 30 J O P Q R 40 30 20 10 विस्थापन (m) स्थितिज ऊर्जा (J) R रेखा से ऊपर है — अगम्य
बिंदुदार रेखा गेंद का नियत 30 J का भंडार है। गेंद केवल उन्हीं बिंदुओं तक जा सकती है जहाँ वक्र इस रेखा से नीचे है।
चरण 1 — कुल यांत्रिक ऊर्जा ज्ञात कीजिए
O पर: v = 0 m s–1, अतः K = 0 J; और U = 30 J
कुल यांत्रिक ऊर्जा E = K + U = 0 + 30 = 30 J
पथ घर्षण रहित है, अतः E हर जगह 30 J ही रहेगी

चरण 2 — प्रत्येक बिंदु पर K = E – U, फिर v = √(2K ÷ m), जहाँ m = 0.5 kg
बिंदुग्राफ से UK = 30 J – Uv = √(2K ÷ m)
P20 J10 J√(2 × 10 ÷ 0.5) = √40 ≈ 6.3 m s⁻¹
Q30 J0 J0 m s⁻¹ — क्षण भर के लिए विराम
R40 J–10 Jअसंभव — गेंद R तक पहुँचती ही नहीं
P पर: K = 30 J – 20 J = 10 J
v = √(2K ÷ m) = √(2 × 10 J ÷ 0.5 kg) = √(40 m2 s–2) = 6.32 m s–1

Q पर: K = 30 J – 30 J = 0 J
v = √0 = 0 m s–1

R पर: K = 30 J – 40 J = –10 J
किंतु K = ½mv2 कभी ऋणात्मक नहीं हो सकती, अतः R तक पहुँचा नहीं जा सकता
वास्तव में क्या होता है: गेंद O से चलकर गड्ढों में तेज होती है, चढ़ाई पर धीमी होती है और Q पर ठीक शून्य चाल से पहुँचती है। Q उसका पलटाव बिंदु है। वहाँ से वह उसी रास्ते लौट आती है, P को फिर 6.3 m s⁻¹ से पार करती है और शून्य चाल के साथ O पर लौट जाती है। घर्षण न होने के कारण वह O और Q के बीच यही यात्रा सदा दोहराती रहती है।
ध्यान दीजिए: किसी भी स्थितिज ऊर्जा ग्राफ पर कुल ऊर्जा के मान पर क्षैतिज रेखा खींच लीजिए। वस्तु केवल उन्हीं भागों में गति कर सकती है जहाँ वक्र उस रेखा से नीचे है; जहाँ वक्र रेखा को छूता है वे उसके पलटाव बिंदु हैं।
प्र15.
1.5 kg द्रव्यमान का एक नारियल, 10 m ऊँचाई वाले एक नारियल के वृक्ष के शिखर से समुद्र तट की गीली रेत पर गिरता है। तट से टकराने पर नारियल रेत में एक गड्ढा बनाकर स्थिर हो जाता है। (i) रेत से टकराने से ठीक पहले नारियल के वेग की गणना कीजिए। (ii) मान लीजिए कि रेत का औसत प्रतिरोधी बल 3000 N है और नारियल की संपूर्ण ऊर्जा का उपयोग रेत में गड्ढा बनाने में किया गया है। नारियल द्वारा रेत में बनाए गए गड्ढे की गहराई का परिकलन कीजिए (g = 10 m s–2 लीजिए)।
उत्तर

(i) लगभग 14.1 m s⁻¹। (ii) गड्ढे की गहराई लगभग 0.05 m अर्थात 5 cm होगी।

(i) टकराने से ठीक पहले चाल
m = 1.5 kg, h = 10 m, g = 10 m s–2

नारियल विरामावस्था से गिरता है और केवल गुरुत्व कार्य करता है, अतः यांत्रिक ऊर्जा संरक्षित है:
शिखर पर स्थितिज ऊर्जा = रेत पर गतिज ऊर्जा
mgh = ½mv2
m कट जाता है: v2 = 2gh = 2 × 10 m s–2 × 10 m = 200 m2 s–2
v = √200 = 14.14 m s–1 ≈ 14.1 m s–1
(ii) गड्ढे की गहराई
नारियल रेत तक जो ऊर्जा लाता है:
E = mgh = 1.5 kg × 10 m s–2 × 10 m = 150 J
(जाँच: ½mv2 = ½ × 1.5 kg × 200 m2 s–2 = 150 J  ✔)

रेत F = 3000 N बल से गहराई d तक विरोध करती है और नारियल पर ऋणात्मक कार्य करती है:
रेत द्वारा किया गया कार्य = –F × d
नारियल रुक जाता है, अतः इस कार्य को पूरी 150 J हटानी होगी:
F × d = 150 J
3000 N × d = 150 J
d = 150 J ÷ 3000 N = 150 N m ÷ 3000 N
d = 0.05 m = 5 cm
रेत नारियल को क्यों बचा लेती है: हटानी तो दोनों स्थितियों में वही 150 J है, किंतु बल रुकने की दूरी पर निर्भर करता है। रेत पर F = 150 J ÷ 0.05 m = 3000 N। पक्के फर्श पर नारियल शायद 1 mm में रुक जाता, जिसके लिए F = 150 J ÷ 0.001 m = 1,50,000 N चाहिए — पचास गुना अधिक, और उसे तोड़ने के लिए पर्याप्त। ठीक इसी कारण हम गद्दे, एयरबैग और पैकिंग सामग्री का उपयोग करते हैं।
एक सूक्ष्म बात: रेत में 0.05 m धँसते समय नारियल इतना और नीचे गिरता है, जिससे उसे mgd = 1.5 × 10 × 0.05 = 0.75 J और मिल जाती है। इसे भी जोड़ें तो 3000d = 150 + 15d, अतः d = 150 ÷ 2985 = 0.0503 m — दो सार्थक अंकों तक वही 5 cm, जैसा प्रश्न में अभीष्ट है।
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