प्र1.
… सदैव चलते रहने वाली मशीनें अर्थात ऐसी मशीनें बनाना संभव हो जो एक बार चलना आरंभ करने के पश्चात बिना ईंधन या विद्युत के उपयोगी कार्य करती रहें?
उत्तर
ऐसी मशीन बन ही नहीं सकती, और कारण वही है जिस पर यह पूरा अध्याय टिका है — किया गया कार्य = ऊर्जा में परिवर्तन। सदा उपयोगी कार्य करते रहने का अर्थ होगा एक ऐसे भंडार से सदा ऊर्जा बाँटते रहना जो कभी भरा ही नहीं जाता।
समय t में दिया गया उपयोगी कार्य = W
मशीन के भंडार से ली गई ऊर्जा = W (और कोई स्रोत है ही नहीं)
समय t के बाद: शेष ऊर्जा = E0 – W
t बढ़ने पर भंडार रिक्त हो जाता है और मशीन को रुकना ही पड़ेगा।
सदैव चलने के लिए चाहिए E0 = अनंत, अथवा शून्य से ऊर्जा का सृजन।
मशीन के भंडार से ली गई ऊर्जा = W (और कोई स्रोत है ही नहीं)
समय t के बाद: शेष ऊर्जा = E0 – W
t बढ़ने पर भंडार रिक्त हो जाता है और मशीन को रुकना ही पड़ेगा।
सदैव चलने के लिए चाहिए E0 = अनंत, अथवा शून्य से ऊर्जा का सृजन।
यदि ऐसी मशीन सचमुच होती तो क्या होता:
- न बिजलीघर चाहिए होते, न बाँध, न ईंधन — हर घर में रखा एक छोटा-सा बक्सा बल्ब, पंप और रेलगाड़ियाँ सदा चलाता रहता, न ईंधन का बिल होता न धुआँ।
- किंतु यही तर्क शेष भौतिकी को तोड़ देता। गिरती गेंद की चाल, राकेट की पहुँच और ईंधन से मिलने वाली ऊष्मा — इन सबका पूर्वानुमान ऊर्जा संरक्षण से ही होता है। यदि ऊर्जा कहीं से भी प्रकट हो सकती तो इनमें से कोई गणना काम न करती — और ये गणनाएँ प्रतिदिन काम करती हैं।
यह विचार बार-बार क्यों लौटता है: अच्छी तरह बना पहिया या चुंबकों की व्यवस्था आश्चर्यजनक रूप से लंबे समय तक घूमती रह सकती है, जो उत्साही आविष्कारक को "सदैव" जैसी लगती है। सावधानी से मापने पर हर बार घर्षण, वायु प्रतिरोध और ध्वनि के कारण धीमी किंतु निरंतर हानि दिखाई देती है। प्रस्तावित प्रत्येक अभिकल्प परीक्षण में ठीक इसी बिंदु पर विफल हुआ है।
क्या आप जानते हैं? हजारों ऐसे अभिकल्पों की विफलता स्वयं में एक वैज्ञानिक प्रमाण है। यह ऊर्जा संरक्षण के नियम के पक्ष में सबसे प्रबल प्रायोगिक साक्ष्यों में से एक है — प्रकृति को इसे तोड़ने का हर अवसर दिया गया और उसने कभी नहीं तोड़ा।