प्रत्येक वास्तविक मशीन के गतिमान पुर्जों पर घर्षण और वायु प्रतिरोध कार्य करते हैं। ये बल निरंतर ऋणात्मक कार्य करते हैं और मशीन की यांत्रिक ऊर्जा को ऊष्मा तथा ध्वनि में बदल देते हैं — ऐसे रूप जो गतिमान पुर्जों में वापस नहीं लौट सकते। ईंधन या विद्युत से भंडार भरा न जाए तो यांत्रिक ऊर्जा घटते-घटते शून्य हो जाती है और मशीन रुक जाती है।
मशीन पर कार्य-ऊर्जा प्रमेय लगाने पर:
यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तन = सभी बलों द्वारा किया गया कार्य
घर्षण व वायु प्रतिरोध सदैव गति का विरोध करते हैं, अतः उनका कार्य ऋणात्मक होता है
एक चक्र के बाद यांत्रिक ऊर्जा = पहले की यांत्रिक ऊर्जा – (ऊष्मा व ध्वनि में गई ऊर्जा)
हर चक्र में भंडार छोटा → गति धीमी → अंततः शून्य
सदैव चलने वाली मशीन को इन दो असंभव बातों में से एक करनी पड़ेगी—
- ऐसी मशीन जो शून्य से ऊर्जा उत्पन्न करे ताकि सदा उपयोगी कार्य करती रहे। यह ऊर्जा संरक्षण के नियम का उल्लंघन है — ऊर्जा रूप बदल सकती है, कहीं से प्रकट नहीं हो सकती।
- ऐसी मशीन जिसमें घर्षण, वायु प्रतिरोध और ध्वनि बिल्कुल न हों और जो केवल चलती रहे। वह भी कोई उपयोगी कार्य नहीं कर सकेगी, क्योंकि निकाला गया प्रत्येक जूल उसके अपने भंडार से ही जाएगा।
घर्षण की हानि क्यों नहीं लौटती: पृष्ठ 126 के "आइए, और चिंतन करें" बॉक्स में यही मुख्य बात कही गई है — गुरुत्वीय, वैद्युत या चुंबकीय बलों के विरुद्ध किया गया कार्य स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित होता है और लौटाया जा सकता है। घर्षण के विरुद्ध किया गया कार्य संचित नहीं होता। वह पुर्जों और वायु में फैली अव्यवस्थित तापीय ऊर्जा बन जाता है, और पहियों, भारों या चुंबकों की कोई भी व्यवस्था उसे वापस नहीं बटोर सकती।
ध्यान दीजिए: अच्छे अभिकल्प से हानि कम की जा सकती है — चिकने बेयरिंग, तेल, धारारेखित आकृति — जिससे मशीन अधिक देर चलती है। शून्य कभी नहीं की जा सकती।