कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 7 सोचिए और बताइए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
चित्र 7.35 में दर्शाए अनुसार चम्मच की सहायता से किसी डिब्बे का ढक्कन खोलना सरल क्यों होता है?
उत्तर

चम्मच यहाँ बहुत बड़े यांत्रिक लाभ वाले प्रथम श्रेणी के उत्तोलक की भाँति कार्य करता है — डिब्बे का किनारा आलंब है, ढक्कन का किनारा भार है और हत्थे के दूर वाले सिरे पर आपका हाथ आयास लगाता है।

भार भुजा = डिब्बे के किनारे से ढक्कन के किनारे तक की दूरी ≈ 1 cm
आयास भुजा = किनारे से आपके हाथ तक की दूरी ≈ 10 cm
यांत्रिक लाभ = आयास भुजा ÷ भार भुजा = 10 cm ÷ 1 cm = 10

अतः हाथ का 20 N बल ढक्कन पर उठाने वाला बल देता है
F2 = F1 × (d1 ÷ d2) = 20 N × 10 = 200 N
ऐसा क्यों होता है: ढक्कन चारों ओर से किनारे में कसा रहता है और उसे उखाड़ने के लिए उँगलियों से कहीं अधिक बल चाहिए। चम्मच कार्य को घटाता नहीं, किंतु आपके हाथ को ढक्कन के किनारे से लगभग दस गुनी दूरी चलाकर बल को दस गुना कर देता है। पूरे समय F1d1 = F2d2 ही लागू रहता है।
यह करके देखिए: चम्मच को सिरे के स्थान पर हत्थे के बीच से पकड़िए। आयास भुजा आधी हो जाती है, यांत्रिक लाभ आधा रह जाता है और ढक्कन उठाना स्पष्ट रूप से कठिन हो जाता है — यही प्रमाण है कि भुजाओं की लंबाई ही निर्णायक है।
प्र2.
किसी कठोर वस्तु को काटने के लिए उसे कैंची के आलंब के निकट क्यों रखा जाता है?
उत्तर

क्योंकि वस्तु को आलंब के पास ले जाने से भार भुजा छोटी हो जाती है, और छोटी भार भुजा का अर्थ है अधिक यांत्रिक लाभ — इसलिए ब्लेड वस्तु पर कहीं बड़ा बल लगाते हैं।

कैंची प्रथम श्रेणी का उत्तोलक है — कील (rivet) आलंब है।
यांत्रिक लाभ = आयास भुजा ÷ भार भुजा
आयास भुजा (कील से उँगलियों तक) समान रहती है, मान लीजिए 8 cm

वस्तु नोक के पास: भार भुजा = 6 cm → यांत्रिक लाभ = 8/6 = 1.3
वस्तु कील के पास: भार भुजा = 1 cm → यांत्रिक लाभ = 8/1 = 8

उँगलियों के 30 N दबाव पर—
नोक के पास: काटने वाला बल = 30 N × 1.3 = 40 N
कील के पास: काटने वाला बल = 30 N × 8 = 240 N
ऐसा क्यों होता है: ब्लेड कील के परितः घूमते हैं, अतः कील के पास का बिंदु बहुत छोटा चाप तय करता है जबकि आपकी उँगलियाँ बड़ा चाप। F1d1 = F2d2 के अनुसार भार पर कम गति के साथ अधिक बल आना ही चाहिए। मोटा गत्ता या तार जैसी कठोर वस्तुओं को यही बड़ा बल चाहिए; मुलायम कागज को नहीं, इसलिए उसे ब्लेड में कहीं भी काटा जा सकता है।
क्या आप जानते हैं? तार काटने वाले प्लास और सँड़सी में जबड़े स्थायी रूप से छोटे और हत्थे लंबे बनाए जाते हैं — ठीक इसी कारण से उनका यांत्रिक लाभ अभिकल्प से ही अधिक होता है।
प्र3.
पूरे इतिहास में (पहियों, भार या चुंबकों का उपयोग करके बने) सदैव चलते रहने वाली मशीनों के कई प्रारूप प्रस्तावित किए गए हैं लेकिन वास्तव में कोई भी सदैव के लिए चलती नहीं रहती है। सभी वास्तविक मशीनें अंतत: धीमी हो कर रुक क्यों जाती हैं? कार्य एवं ऊर्जा के पदों में व्याख्या कीजिए।
उत्तर

प्रत्येक वास्तविक मशीन के गतिमान पुर्जों पर घर्षण और वायु प्रतिरोध कार्य करते हैं। ये बल निरंतर ऋणात्मक कार्य करते हैं और मशीन की यांत्रिक ऊर्जा को ऊष्मा तथा ध्वनि में बदल देते हैं — ऐसे रूप जो गतिमान पुर्जों में वापस नहीं लौट सकते। ईंधन या विद्युत से भंडार भरा न जाए तो यांत्रिक ऊर्जा घटते-घटते शून्य हो जाती है और मशीन रुक जाती है।

मशीन पर कार्य-ऊर्जा प्रमेय लगाने पर:
यांत्रिक ऊर्जा में परिवर्तन = सभी बलों द्वारा किया गया कार्य
घर्षण व वायु प्रतिरोध सदैव गति का विरोध करते हैं, अतः उनका कार्य ऋणात्मक होता है
एक चक्र के बाद यांत्रिक ऊर्जा = पहले की यांत्रिक ऊर्जा – (ऊष्मा व ध्वनि में गई ऊर्जा)
हर चक्र में भंडार छोटा → गति धीमी → अंततः शून्य

सदैव चलने वाली मशीन को इन दो असंभव बातों में से एक करनी पड़ेगी—

  • ऐसी मशीन जो शून्य से ऊर्जा उत्पन्न करे ताकि सदा उपयोगी कार्य करती रहे। यह ऊर्जा संरक्षण के नियम का उल्लंघन है — ऊर्जा रूप बदल सकती है, कहीं से प्रकट नहीं हो सकती।
  • ऐसी मशीन जिसमें घर्षण, वायु प्रतिरोध और ध्वनि बिल्कुल न हों और जो केवल चलती रहे। वह भी कोई उपयोगी कार्य नहीं कर सकेगी, क्योंकि निकाला गया प्रत्येक जूल उसके अपने भंडार से ही जाएगा।
घर्षण की हानि क्यों नहीं लौटती: पृष्ठ 126 के "आइए, और चिंतन करें" बॉक्स में यही मुख्य बात कही गई है — गुरुत्वीय, वैद्युत या चुंबकीय बलों के विरुद्ध किया गया कार्य स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित होता है और लौटाया जा सकता है। घर्षण के विरुद्ध किया गया कार्य संचित नहीं होता। वह पुर्जों और वायु में फैली अव्यवस्थित तापीय ऊर्जा बन जाता है, और पहियों, भारों या चुंबकों की कोई भी व्यवस्था उसे वापस नहीं बटोर सकती।
ध्यान दीजिए: अच्छे अभिकल्प से हानि कम की जा सकती है — चिकने बेयरिंग, तेल, धारारेखित आकृति — जिससे मशीन अधिक देर चलती है। शून्य कभी नहीं की जा सकती।
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