प्र1.
पिछले अध्याय के चित्र (6.8) में एक भारोत्तोलक दर्शाई गई है जिसने भारोत्तोलन दंड (barbell) को अपने हाथों में पकड़ कर स्थिर रखा हुआ है। क्या वह इस दंड को स्थिर पकड़े रखने में कोई कार्य करती है?
उत्तर
नहीं। वह दंड पर शून्य कार्य करती है, क्योंकि दंड का कोई विस्थापन नहीं होता।
W = F × s
वह ऊपर की ओर जो बल लगाती है = दंड का भार = mg
दंड का विस्थापन, s = 0
W = mg × 0 = 0 J
वह ऊपर की ओर जो बल लगाती है = दंड का भार = mg
दंड का विस्थापन, s = 0
W = mg × 0 = 0 J
ऐसा क्यों होता है: विज्ञान में कार्य के लिए बल की दिशा में विस्थापन आवश्यक है। दंड अपने स्थान पर ही रहता है, अतः उसे कोई ऊर्जा स्थानांतरित नहीं होती — न उसकी गतिज ऊर्जा बदलती है, न स्थितिज ऊर्जा।
फिर भी वह थक जाती है। बल लगाए रखने के लिए उसकी माँसपेशियों के तंतु बार-बार सिकुड़ते और फैलते हैं। इसमें शरीर में संचित रासायनिक ऊर्जा व्यय होती है और उसका अधिकांश भाग ऊष्मा बन जाता है। अर्थात ऊर्जा उसके शरीर के भीतर व्यय होती है, दंड पर नहीं। थकान कार्य होने की वैज्ञानिक कसौटी नहीं है।