कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 11 क्रियाकलाप 11.1 के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
खेत में कर्तन (Cutting) विधि का अवलोकन करते समय निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान दीजिए। (i) क्या माली, वैज्ञानिक अथवा बागवानी विशेषज्ञ किसी पौधे की अत्यधिक बढ़ी हुई शाखाओं को उसके वर्धनकाल के अंत में काटते हैं? (विभिन्न पौधों के वर्धन-काल अलग होते हैं।) (ii) इन्हें नए पौधे उगाने के उद्देश्य से किसी पौधे की कर्तन तैयार करते हुए देखिए। कर्तन की औसत लंबाई लिखिए। (iii) कर्तन पर पर्वसंधियों और पर्वों की संख्या गिनिए।
उत्तर

(i) हाँ। माली अत्यधिक बढ़ी हुई शाखाओं की कटाई-छँटाई वर्धनकाल के अंत में ही करते हैं और उसी कटी सामग्री से कर्तन तैयार करते हैं।

(ii) और (iii) — जो आप वास्तव में मापें वही लिखिए। प्ररोह की एक प्रारूपिक कर्तन लगभग 15 – 20 cm लंबी होती है और उस पर 3 – 5 पर्वसंधियाँ होती हैं, अर्थात उनके बीच 2 – 4 पर्व।

पौधावर्धनकाल कब समाप्त होता हैकर्तन की लंबाई (cm)पर्वसंधियाँपर्व
मनीप्लांटगर्म स्थानों में वर्षभर1532
गुलाबशीत ऋतु की पुष्पन-अवधि के बाद2043
गन्ना (सेट)कटाई के समय3032
वर्धनकाल के अंत में ही क्यों: तब तक प्ररोह का बढ़ना पूरा हो चुका होता है और उसमें भोजन संचित हो चुका होता है, और उसकी कलिकाएँ परिपक्व तो हैं पर अभी प्रसुप्त हैं। ऐसी कर्तन में जड़ें बनने तक जीवित रहने का पर्याप्त भंडार होता है और वह उस भंडार को पहले नई पत्तियाँ बनाने में नहीं गँवाती। बीच वर्धनकाल में ली गई कर्तन कोमल और जलयुक्त होती है और जड़ें बनने से पहले ही मुरझा जाती है।
पर्वसंधियाँ क्यों गिनी जाती हैं: पर्वसंधि वह स्थान है जहाँ पत्ती और कक्षस्थ कलिका जुड़ी होती है, और तने पर केवल यही स्थान है जहाँ नई जड़ें और नए प्ररोह बना सकने वाला ऊतक उपस्थित होता है। दो पर्वसंधियों के बीच के पर्व में यह नहीं होता। अतः जिस कर्तन पर एक भी पर्वसंधि न हो वह चाहे कितनी भी लंबी हो, पौधा नहीं बन सकती — यह तय करती है लंबाई नहीं, पर्वसंधियों की संख्या।
संकेत: कर्तन प्रातःकाल एकत्र कीजिए (क्रियाकलाप का चरण 2)। उस समय दिन भर के वाष्पोत्सर्जन से पहले तने में जल सबसे अधिक होता है, अतः कर्तन अधिकतम जल-भंडार के साथ आरंभ करती है।
प्र2.
कर्तन को उनकी लंबाई के लगभग आधे भाग तक खाद मिली मिट्टी की सतह से लगभग 45°– 60° के कोण पर अंतर्विष्ट कीजिए (चित्र 11.2)। इनमें नियमित रूप से पानी दीजिए और यदि कोई परिवर्तन दिखाई देते हैं तो उनका अवलोकन कीजिए।
उत्तर

लगभग दो से तीन सप्ताह में दबी हुई पर्वसंधियों से जड़ें निकलती हैं और मिट्टी के ऊपर वाली पर्वसंधियों से नए प्ररोह फूटते हैं। मिट्टी में खाद इसलिए मिलाई जाती है कि वह नमी रोके रखती है और मिट्टी को इतना पोला रखती है कि कोमल जड़ें उसमें बढ़ सकें।

कर्तन को सीधा गाड़ने के बजाय तिरछा क्यों लगाया जाता है: तिरछी लगी कर्तन उतनी ही गहराई में तने का अधिक लंबा भाग मिट्टी के भीतर रखती है, अतः अधिक पर्वसंधियाँ नम मिट्टी के संपर्क में रहती हैं। यदि कर्तन को सतह से θ कोण पर गहराई h तक गाड़ा जाए तो दबी हुई लंबाई होगी
L = h ÷ sin θ
θ = 45° पर: L = h ÷ 0.707 = 1.41 h
θ = 60° पर: L = h ÷ 0.866 = 1.15 h
सीधा गाड़ने पर (θ = 90°): L = h ÷ 1 = h

अर्थात 45° पर लगाने से उतनी ही गहराई में सीधा गाड़ने की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत अधिक तना मिट्टी में रहता है — जड़ बनने वाले क्षेत्र में अधिक पर्वसंधियाँ, और वे पर्वसंधियाँ ठंडी अधोमृदा में जाने के बजाय मिट्टी की गर्म, नम ऊपरी परत में ही रहती हैं।

निचली पत्तियाँ क्यों हटाई जाती हैं (चरण 3): पत्तियाँ वाष्पोत्सर्जन द्वारा जल खोती हैं। जड़ें बनने तक कर्तन के पास उस जल को पूरा करने का कोई साधन नहीं होता, अतः उस पर लगी हर पत्ती एक रिसाव है। निचली पत्तियाँ हटाने से यह हानि घट जाती है; ऊपर की कुछ पत्तियाँ इसलिए छोड़ी जाती हैं कि प्रकाश संश्लेषण से जड़ों की वृद्धि के लिए शर्करा मिलती रहे। मिट्टी में दबी पत्तियाँ सड़कर कवकों को भी निमंत्रण देतीं।
स्वयं जाँचिए: मनीप्लांट की समान लंबाई वाली दो कर्तन लगाइए — एक पर सारी पत्तियाँ रहने दीजिए और दूसरी पर केवल ऊपर की दो। दूसरी प्रायः पहले जड़ पकड़ती है — अर्थात इस अवस्था में सीमित करने वाला कारक पत्तियों की संख्या नहीं, जल की हानि है।
प्र3.
पौधे को नियमित रूप से जल दीजिए और पौधा ‘A’ के साथ-साथ पौधा ‘B’ की वृद्धि का अवलोकन कीजिए। [कलम बाँधना]
उत्तर

दो-तीन सप्ताह में कलम जुड़ जाती है और पौधा B के टुकड़े पर लगी कलिकाएँ फूट पड़ती हैं। इसके बाद प्ररोह, पत्तियाँ और पुष्प सब पौधा B की किस्म के होते हैं, जबकि कलम के जोड़ से नीचे का पूरा भाग पौधा A ही रहता है। यदि पौधा B पीले गुलाब का था तो अब जंगली गुलाब की जड़ प्रणाली पर पीले गुलाब खिलेंगे।

यह कार्य क्यों करता है: पौधा B का टुकड़ा (सायन) एक कायिक भाग है, अतः वह समसूत्री विभाजन से बढ़ता है और पौधा B के प्रत्येक लक्षण को यथावत बनाए रखता है। उसकी अपनी जड़ें नहीं होतीं, इसलिए उसे पौधा A (मूलवृंत) से इस प्रकार जोड़ना पड़ता है कि जल और खनिज ऊपर उसमें जा सकें और शर्करा नीचे आ सके। यह तभी होता है जब दोनों टुकड़ों का एधा (कैम्बियम) — छाल के ठीक नीचे की पतली विभाजनशील परत — आपस में स्पर्श करे। दोनों एधाओं से नई कोशिकाएँ बनकर मिलती हैं, कैलस बनाती हैं और फिर दारु तथा फ्लोएम जोड़ देती हैं, जिससे दोनों तने एक ही परिवहन तंत्र बन जाते हैं।

पौधा A की अन्य शाखाएँ क्यों काटी जाती हैं (चरण 4): मूलवृंत पर छूटी हुई शाखा जड़ों से आने वाले जल और भोजन के लिए स्पर्धा करती है, और पहले से स्थापित होने के कारण जीत जाती है। उन शाखाओं को हटा देने से पूरी आपूर्ति सायन को मिलती है।

जोड़ को क्यों ढका जाता है (चरण 4): ताजा कटाव एक खुला घाव है। कपड़ा या रैपिंग फिल्म उसे सूखने से बचाती है, कैलस बनने तक दोनों टुकड़ों को दबाकर जोड़े रखती है, और घाव भरने तक कीटों तथा कवक-बीजाणुओं को भीतर नहीं जाने देती।

संकेत: कलमी पौधा आनुवंशिक रूप से दो पौधे हैं जो एक होकर जी रहे हैं। यदि कभी कलम के जोड़ से नीचे कोई प्ररोह फूटे तो वह जंगली मूलवृंत का है और उस पर मूलवृंत के ही पुष्प आएँगे, आपकी चुनी किस्म के नहीं — उसे दिखते ही काट दीजिए।
प्र4.
इसमें नियमित रूप से पानी दीजिए और मिट्टी में दबी टहनी पर नई पत्तियों की वृद्धि को देखिए। 10 – 15 दिनों के पश्चात मिट्टी में दबी टहनी वाले भाग में जड़ें विकसित हो जाएँगी। [परतन]
उत्तर

दबी हुई टहनी पर नई पत्तियाँ निकलती रहती हैं और 10 – 15 दिनों के पश्चात दबे हुए भाग से जड़ें बन जाती हैं। जड़ें जम जाने पर टहनी को जनक पौधे से काट दिया जाता है और वह एक स्वतंत्र पौधा बन जाती है — जनक वृक्ष का क्लोन।

परतन कर्तन से अधिक विश्वसनीय क्यों है: कर्तन अलग होते ही अकेली पड़ जाती है — बिना जड़ों के उसे जल खोजना पड़ता है। परतन वाली टहनी पूरे समय जनक से जुड़ी रहती है, अतः जनक की जड़ों से जल और खनिज तथा जनक की पत्तियों से शर्करा उसे मिलती रहती है। वह मुरझा ही नहीं सकती। इसीलिए जड़ें बनने से पहले ही उस पर नई पत्तियाँ निकलती रहती हैं।
जड़ें ठीक दबे हुए मोड़ पर ही क्यों बनती हैं: वहाँ दो बातें एक साथ मिलती हैं। मिट्टी अंधकार और स्थिर नमी देती है, जो जड़ों के प्रारंभिक बिंदुओं के बाहर निकलने के लिए आवश्यक है। और मोड़ के कारण फ्लोएम में नीचे जाती शर्करा वहाँ धीमी पड़ जाती है, अतः तने के उस भाग में भोजन एकत्र हो जाता है जो जड़ें बनाने में काम आता है। जड़ें वास्तव में वहीं दबी पर्वसंधियों से निकलती हैं।
यह भी कीजिए: नींबू, अमरूद, चमेली, बोगनवेलिया और अनार में परतन सरलता से हो जाता है। कोई पतली लचीली टहनी चुनिए, जिस भाग को दबाना है वहाँ की थोड़ी छाल खुरच दीजिए (इससे शर्करा का प्रवाह और धीमा होता है), उसे मिट्टी में दबाकर खूँटी से रोक दीजिए और पानी देते रहिए — और पंद्रह दिन धैर्य रखिए।
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