जब पौधा किसी चुने हुए जनक की यथार्थ प्रति होना चाहिए तब कृषक अलैंगिक (कायिक) विधि चुनता है, और जब उसे ऐसा बीज चाहिए जो सरलता से संचित हो, सस्ते में ले जाया जा सके और लक्षणों के नए संयोजन ले आए तब वह लैंगिक (बीज) विधि चुनता है।
| कृषक को चाहिए… | चुनी गई विधि | फसलें | कारण |
|---|---|---|---|
| हर पौधा एक ही उत्तम जनक के समरूप | कायिक — कर्तन, कलम बाँधना, परतन, ऊतक संवर्धन | गन्ने की कर्तन, आलू के कंद, केले के पादपक, कलमी आम और गुलाब, अदरक | केवल समसूत्री विभाजन होता है, अतः सारी संतति क्लोन होती है — वही मिठास, वही आकार, वही पकने का समय |
| ऐसी फसल जिसमें उपयोगी बीज बनते ही नहीं | केवल कायिक | केला, बीजरहित अंगूर, गन्ना | कोई दूसरा मार्ग है ही नहीं — इन्हें बीज से उगाया ही नहीं जा सकता |
| शीघ्र फसल | कायिक | गन्ना, आलू | कर्तन या कंद में पहले से पर्वसंधियाँ और संचित भोजन होता है, अतः बीज-अंकुरण और नवोद्भिद की अवस्थाएँ छूट जाती हैं |
| सस्ता, संचय योग्य, ले जाने में सरल रोपण-द्रव्य और नई किस्में | लैंगिक — बीज | गेहूँ, चावल, मक्का, सरसों, दालें | बीज छोटे और सूखे होते हैं; प्रत्येक बीज में लक्षणों का नया संयोजन होता है, अतः श्रेष्ठ पौधों का चयन संभव है |