प्र1.
तीन दिनों के पश्चात आवर्धक लेंस का प्रयोग करके ब्रेड अथवा रोटी की सतह का ध्यानपूर्वक अवलोकन कीजिए। क्या आपको इस पर कवक (फफूँद) की वृद्धि दिखाई देती है?
उत्तर
हाँ। तीसरे दिन तक सतह पर रुई जैसे सफेद या धूसर तंतु दिखते हैं और उन पर छोटे-छोटे गहरे रंग के पिन-सिर — राइजोपस में काले, ऐस्पर्जिलस में हरे-काले। दिन बीतने के साथ धब्बा फैलता और गहराता जाता है।
नमीयुक्त कक्ष इसी प्रकार क्यों बनाया जाता है: कवक के बीजाणुओं को तीन चीजें एक साथ चाहिए और यह कक्ष तीनों देता है।
- नमी — गीली रुई और टिशू पेपर से। सूखा बीजाणु अंकुरित नहीं हो सकता; इसीलिए ब्रेड सूखने लगे तो जल की कुछ बूँदें डालनी होती हैं।
- ऊष्मा, 25 – 35 °C — वह ताप जिस पर कवक के एंजाइम सबसे तेज काम करते हैं। इससे नीचे बीजाणु धीरे अंकुरित होते हैं या होते ही नहीं, और इसीलिए हम विकारीय भोजन का प्रशीतन करते हैं।
- पोषक तत्व — ब्रेड या रोटी का मंड, जिसे कवक तंतु पचाकर अवशोषित करते हैं।
स्वयं जाँचिए: ठीक वैसा ही एक और नमीयुक्त कक्ष बनाकर प्रशीतित्र में रख दीजिए। तीन दिन बाद उस पर फफूँद नाममात्र की होगी जबकि गर्म वाला ढका हुआ होगा। वही ब्रेड, वही जल, वायु में वही बीजाणु — केवल ताप भिन्न है, अतः अंतर ताप के कारण ही है। यह अकेली तुलना एक उचित परीक्षण है।