अन्य जीवित सूक्ष्मजीवों से — उन बीजाणुओं और कोशिकाओं से जो पहले से ही वायु, धूल, जल या सतह पर उपस्थित थे। ये निर्जीव भोजन से स्वयं कभी उत्पन्न नहीं होते।
हम इसके प्रति निश्चित क्यों हैं: लंबे समय तक लोग स्वतः जनन में विश्वास करते थे — कि माँस से कीड़े और ब्रेड से फफूँद अपने आप उत्पन्न हो जाती है। लुई पाश्चर ने प्रयोग द्वारा यह प्रश्न सुलझा दिया। उन्होंने दिखाया कि यदि वायु के सूक्ष्मजीवों को दूर रखा जाए तो पोषक शोरबा अनिश्चित काल तक स्वच्छ बना रहता है और जैसे ही उन्हें प्रवेश दिया जाता है वह तुरंत धुँधला पड़ जाता है। अर्थात नव जीवन सदैव पहले से विद्यमान जीवन से ही उत्पन्न होता है। इसी से उनका रोग का रोगाणु सिद्धांत आया — कि विशेष रोग विशेष सूक्ष्मजीवों से होते हैं — और कोशिका सिद्धांत को पुष्टि मिली कि सभी कोशिकाएँ पहले से विद्यमान कोशिकाओं से ही बनती हैं।
दैनिक जीवन में इसका परिणाम: यदि सूक्ष्मजीव सदैव बाहर से आते हैं तो उन्हें बाहर रोकना या पहले से उपस्थित को नष्ट करना भोजन को सुरक्षित रखेगा और संक्रमण रोकेगा। इसीलिए हम जल उबालते हैं, प्रेशर कुकर में पकाते हैं और शल्य उपकरणों का निर्जर्मीकरण करते हैं, और इसीलिए चिकित्सालय में निर्जर्मीकृत पट्टी पर आग्रह किया जाता है।
संकेत: ध्यान दीजिए कि क्रियाकलाप 11.3 इसी विचार पर कितनी सावधानी से बना है। रुई और टिशू पेपर को पहले से उबाले गए जल से नम किया जाता है, अतः उस जल में कोई जीवित सूक्ष्मजीव नहीं होता। इसके बाद ब्रेड पर जो भी फफूँद उगेगी वह केवल वायु से ही आ सकती है — यह क्रियाकलाप आपका अपना छोटा-सा पाश्चर प्रयोग है।