प्र1.
इनमें से किन विधियों में आप पाते हैं कि पुष्प फलों में परिवर्तित हो गए हैं?
उत्तर
एक को छोड़कर सभी विधियों में फल बनते हैं — केवल उस कली में नहीं जिसके पुंकेसर हटाकर उसे थैली से ढक दिया गया था।
| विधि | क्या परागकण वर्तिकाग्र तक पहुँच सका? | फल निर्माण (हाँ/नहीं) |
|---|---|---|
| पुष्प की कली (थैली में, पुंकेसर सहित) | हाँ — बंद कली के भीतर उसी का परागकण | हाँ |
| पुंकेसर निकाली गई पुष्प कली (थैली में) | नहीं — भीतर परागकण है ही नहीं और बाहर से आ नहीं सकता | नहीं |
| पुंकेसर निकाला गया पुष्प (थैली में) | हाँ — कली अवस्था में ही वह स्व-परागित हो चुका था | हाँ |
| पुष्प (थैली में, पुंकेसर सहित) | हाँ — उसी का परागकण | हाँ |
| पुष्प (थैली के बिना) | हाँ — उसका अपना परागकण, और आगंतुक भी आ सकते थे | हाँ |
खुले पुष्प से पुंकेसर हटाना देर से क्यों होता है: मटर में दल मिलकर एक बंद नौतल (कील) बनाते हैं और परागकोश अपने परागकण सीधे वर्तिकाग्र पर तभी झाड़ देते हैं जब पुष्प अभी कली ही होता है। पुष्प के खिलने तक उसका परागण हो चुका होता है। इसीलिए तीसरी विधि में भी फली बन जाती है। केवल कम विकसित कली में, परागकोश खुलने से पहले, पुंकेसर हटाना सचमुच परागकण छीन लेता है — और केवल उसी विधि में फल नहीं बनता। परिणामों का यह प्रतिरूप संयोग नहीं है; यह इस बात की सीधी पहचान है कि मटर का पुष्प स्व-परागण कैसे करता है।
संकेत: इसीलिए पादप प्रजनक नियंत्रित संकरण करते समय पुष्पों का विपुंसन कली अवस्था में करते हैं। पुष्प के खिलने की प्रतीक्षा की तो पौधा यह काम स्वयं कर चुका होगा।