कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 11 क्रियाकलाप 11.7 के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
दोनों युक्तियों की तुलना और विश्लेषण निम्नलिखित आधार पर कीजिए (तालिका 11.3) — • परागकण और बीज का अनुपात • परागण और बीज निर्माण की क्षमता
उत्तर

वायु-परागित घास प्रत्येक बीज के लिए लगभग 6,000 परागकण बनाती है; कीट-परागित सूरजमुखी केवल 33। प्रति परागकण कीट-परागण कहीं अधिक कुशल है, पर प्रति परागकण वायु-परागण कहीं अधिक सस्ता है।

परागण युक्तिप्रति पुष्प परागकणनिर्मित बीजपरागकण : बीज (मध्य मान)अनुपात का परिसर1,00,000 परागकणों पर बीज
वायु-परागित घास (मक्का, गेहूँ)5,00,000 – 10,00,00050 – 2007,50,000 : 125 = 6,000 : 12,500 : 1 से 20,000 : 1लगभग 17
कीट-परागित पौधे (सूरजमुखी)20,000 – 40,000800 – 1,00030,000 : 900 = 33 : 120 : 1 से 50 : 1लगभग 3,000
वायु के लिए सर्वोत्तम स्थिति = 5,00,000 ÷ 200 = 2,500 : 1   निकृष्टतम = 10,00,000 ÷ 50 = 20,000 : 1
कीट के लिए सर्वोत्तम = 20,000 ÷ 1,000 = 20 : 1   निकृष्टतम = 40,000 ÷ 800 = 50 : 1
कुशलता का अनुपात = 6,000 ÷ 33 ≈ 180

तुलना का पाठ —

  • परागकण और बीज का अनुपात। वायु-परागण को प्रत्येक बीज के लिए लगभग 180 गुना अधिक परागकण चाहिए। वायु की सर्वोत्तम स्थिति (2,500 : 1) भी कीट की निकृष्टतम स्थिति (50 : 1) से पचास गुना खराब है।
  • परागण की क्षमता। वायु के लिए बहुत कम — अधिकांश परागकण मिट्टी, जल, पत्तियों या गलत जाति पर गिरते हैं। कीटों के लिए अधिक, क्योंकि परागणकारी एक ही प्रकार के पुष्प से उसी प्रकार के दूसरे पुष्प पर जाता है।
  • बीज निर्माण की क्षमता। कीट-परागित सूरजमुखी के एक ही पुष्पक्रम से 800 – 1,000 बीज बनते हैं जबकि घास से 50 – 200, अतः वह अपने बीजांडों का कहीं बड़ा भाग बीजों में बदल पाता है।
संरचनाएँ युक्तियों से क्यों मेल खाती हैं: वायु-परागित घास के परागकण छोटे, हल्के, चिकने और सूखे होते हैं ताकि वे हवा में टिके रहें, और उसका वर्तिकाग्र लंबा तथा पंखनुमा होता है जो वायुधारा के आर-पार जाल की तरह काम करता है। कीट-परागित पुष्प के परागकण बड़े, चिपचिपे या काँटेदार होते हैं जो शरीर से चिपक जाएँ, और उसका छोटा चिपचिपा वर्तिकाग्र केवल उतना ही रोके जितना कीट लाता है। हर अभिकल्प ठीक वही है जो उसकी ढुलाई व्यवस्था माँगती है।
प्र2.
स्पष्ट कीजिए कि पुष्प द्वारा बहुत बड़ी संख्या में परागकणों को उत्पन्न करना अब भी एक प्रभावी परागण युक्ति क्यों है।
उत्तर

क्योंकि पौधे के लिए महत्त्व एक परागकण की सफलता दर का नहीं, अंत में बने बीजों की संख्या का है — और अत्यंत छोटी प्रायिकता को बहुत बड़ी संख्या से गुणा करने पर भी उपयोगी परिणाम मिल जाता है।

अपेक्षित बीज = N × p  (N = मुक्त परागकण, p = एक परागकण के अपनी जाति के वर्तिकाग्र तक पहुँचने की प्रायिकता)
गेहूँ के पुष्प के लिए: N = 7,50,000, p ≈ 1.7 × 10−4
N × p = 7,50,000 × 1.7 × 10−4125 बीज

पौधा p नहीं बढ़ा सकता क्योंकि वह वायु की दिशा तय नहीं कर सकता। अतः वह N बढ़ा देता है। चार और कारण इस सौदे को समझदारी भरा बना देते हैं —

  • परागकण बनाना सस्ता है। वह सूक्ष्म, सूखा और हल्का होता है। दल, गंध ग्रंथियाँ और मकरंद प्रति पुष्प कुछ लाख परागकणों से कहीं अधिक महँगे पड़ते हैं — अतः घास परागकणों पर खर्च करती है और सूरजमुखी विज्ञापन पर, और दोनों को बीज मिल जाते हैं।
  • किसी दूसरी जाति की आवश्यकता नहीं। वायु सब जगह और हर समय चलती है। कीट-परागित पौधा तब विफल हो जाता है जब उसके परागणकारी लुप्त हो जाएँ — ठीक अभ्यास प्रश्न 12 वाले सेब के उद्यान की समस्या — जबकि वायु-परागित पौधे का वाहक कभी नहीं छूटता।
  • इन पौधों की खेती का ढंग संभावना सुधार देता है। गेहूँ, मक्का और चावल एक ही जाति के घने खेतों में खड़े होते हैं, अतः परागकण को अपनी जाति के वर्तिकाग्र तक बहुत दूर जाना ही नहीं पड़ता। घने खेत में p का प्रभावी मान अकेले खड़े पौधे की तुलना में कहीं बेहतर होता है।
  • वर्तिकाग्र पकड़ने के लिए बना है। लंबा, पंखनुमा वर्तिकाग्र चलती वायु के सामने बड़ा क्षेत्रफल प्रस्तुत करता है, जिससे पकड़ की प्रायिकता बिना किसी को आकर्षित किए ही बढ़ जाती है।
यहाँ ‘कुशल’ और ‘प्रभावी’ एक शब्द क्यों नहीं हैं: कुशलता पूछती है कि खर्च की प्रति इकाई कितना मिला; प्रभाविता पूछती है कि काम हुआ या नहीं। वायु-परागण प्रति परागकण अकुशल है और फिर भी पूर्णतः प्रभावी है, क्योंकि परागकण इतने सस्ते हैं कि कम प्रायिकता की भरपाई के लिए आवश्यक संख्या में बनाए जा सकते हैं। संसार के अधिकांश लोगों को भोजन देने वाली तीनों फसलें — गेहूँ, मक्का और चावल — इसी युक्ति का उपयोग करती हैं।
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