प्र1.
बीज निर्माण के संबंध में वायु द्वारा परागण और कीटों द्वारा परागण जैसी सामान्य प्राकृतिक युक्तियों की अनुमानित सफलता दर क्या है?
उत्तर
यदि सफलता को ‘प्रति परागकण बने बीज’ से मापें तो वायु-परागण की सफलता लगभग 6,000 परागकणों में एक बार होती है और कीट-परागण की लगभग 33 में एक बार — अर्थात प्रति परागकण कीट-परागण लगभग 180 गुना अधिक कुशल है। ये आँकड़े सीधे तालिका 11.3 से निकलते हैं।
सफलता दर = निर्मित बीज ÷ मुक्त परागकण
वायु (मक्का, गेहूँ): मध्य मान → परागकण = (5,00,000 + 10,00,000) ÷ 2 = 7,50,000; बीज = (50 + 200) ÷ 2 = 125
सफलता दर = 125 ÷ 7,50,000 = 1.7 × 10−4 = 0.017%, अर्थात लगभग 6,000 परागकणों पर 1 बीज
कीट (सूरजमुखी): मध्य मान → परागकण = (20,000 + 40,000) ÷ 2 = 30,000; बीज = (800 + 1,000) ÷ 2 = 900
सफलता दर = 900 ÷ 30,000 = 3.0 × 10−2 = 3.0%, अर्थात लगभग 33 परागकणों पर 1 बीज
कुशलताओं का अनुपात = 3.0% ÷ 0.017% ≈ 180 गुना
वायु (मक्का, गेहूँ): मध्य मान → परागकण = (5,00,000 + 10,00,000) ÷ 2 = 7,50,000; बीज = (50 + 200) ÷ 2 = 125
सफलता दर = 125 ÷ 7,50,000 = 1.7 × 10−4 = 0.017%, अर्थात लगभग 6,000 परागकणों पर 1 बीज
कीट (सूरजमुखी): मध्य मान → परागकण = (20,000 + 40,000) ÷ 2 = 30,000; बीज = (800 + 1,000) ÷ 2 = 900
सफलता दर = 900 ÷ 30,000 = 3.0 × 10−2 = 3.0%, अर्थात लगभग 33 परागकणों पर 1 बीज
कुशलताओं का अनुपात = 3.0% ÷ 0.017% ≈ 180 गुना
वायु इतनी अपव्ययी क्यों है: वायु को नहीं पता कि वह कहाँ जा रही है। गेहूँ के परागकोश से निकला परागकण वहीं जाता है जहाँ हवा चलती है; उसके अपनी ही जाति के वर्तिकाग्र पर उतरने की संभावना नगण्य है। इसके विपरीत कीट एक ही प्रकार के पुष्प के बाद उसी प्रकार के दूसरे पुष्प पर जाता है, क्योंकि उसने सीख लिया है कि मकरंद वहीं है — अतः उसके शरीर से लगा परागकण लगभग सही पते पर पहुँचता है। दलों, सुगंध और मकरंद पर खर्च करके पौधा यही सटीकता खरीदता है।