कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 11 सोचिए और बताइए के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
गुड़हल (Hibiscus or China-rose) के एक पौधे में परागकण के वर्तिकाग्र पर पहुँचने के पश्चात पराग नलिका वर्तिका से होते हुए आगे बढ़ती है। इसके पश्चात कौन-सी प्रक्रिया होने वाली है?
उत्तर

निषेचन। पराग नलिका बीजांड की ओर बढ़ रही है, और जैसे ही उसके भीतर का नर युग्मक अंडकोशिका से युग्मित होगा, निषेचन हो जाएगा और युग्मनज बन जाएगा।

परागण → वर्तिकाग्र पर परागकण का अंकुरण → वर्तिका से नीचे पराग नलिका की वृद्धि
→ नलिका अंडाशय में प्रवेश करके बीजांड तक पहुँचती है
नर युग्मक का अंडकोशिका से युग्मन = निषेचन
युग्मनज → भ्रूण; बीजांड → बीज; अंडाशय → फल
नलिका की आवश्यकता ही क्यों पड़ती है: नर युग्मक की कोई पूँछ नहीं होती और वह तैर नहीं सकता, जबकि अंडकोशिका अंडाशय की तली में बीजांड के भीतर बंद है — वर्तिकाग्र से कई मिलीमीटर नीचे। परागकण इसका समाधान एक नलिका उगाकर करता है, जो उसका ही जीवित विस्तार है और वर्तिका के ऊतक से होती हुई नीचे बढ़कर युग्मक को ठीक बीजांड तक पहुँचा देती है। पौधे में नर युग्मक यात्रा नहीं करता; नलिका उसे ले जाती है।
संकेत: दोनों शब्द अलग रखिए। परागण केवल परागकोश से वर्तिकाग्र तक परागकण का स्थानांतरण है। निषेचन दो युग्मकों का युग्मन है। परागण होकर भी निषेचन न हो, यह संभव है — जैसे तब जब परागकण गलत जाति का हो और उस वर्तिका में नलिका न उगा सके।
प्र2.
नीचे दिए गए मदार (Calotropis) के बीजों और डेंडेलियन के बीजों के चित्र (चित्र 11.16) देखिए। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि ये बीज किस प्रकार के बीज-प्रकीर्णन के लिए अनुकूलित हैं?
उत्तर

दोनों वायु द्वारा प्रकीर्णन के लिए अनुकूलित हैं। देखिए कि चित्र 11.16 वास्तव में क्या दिखाता है।

  • (क) मदार के बीज — चपटे भूरे बीज, प्रत्येक के एक सिरे पर लंबे, महीन, रेशमी सफेद रोमों का घना गुच्छा।
  • (ख) डेंडेलियन के बीज — पूरा गोलाकार सफेद सिर; प्रत्येक बीज एक डंडी के नीचे लटका है जिसका ऊपरी सिरा पंखनुमा रोमों के छल्ले में खुलता है, मानो छोटा-सा पैराशूट हो। चित्र में कुछ बीज छूटकर उड़ते हुए भी दिख रहे हैं।
रोम बीज को यात्रा करने योग्य क्यों बना देते हैं: गिरता हुआ बीज तब तक तेज होता जाता है जब तक वायु का ऊपर की ओर लगने वाला घर्षण बल उसके भार के बराबर न हो जाए। उस स्थिर चाल पर —
भार = घर्षण बल  →  mg = ½ ρ Cd A vt2
अतः  vt = √(2mg ÷ ρ Cd A)  →  vt√(m / A)

रोम क्षेत्रफल A बहुत बढ़ा देते हैं और द्रव्यमान m लगभग कुछ नहीं बढ़ाते। अतः सीमांत चाल vt तेजी से घट जाती है — डेंडेलियन का बीज गिरने के बजाय कुछ सेंटीमीटर प्रति सेकंड की चाल से तैरता उतरता है। सेकंड के अंश के बजाय मिनटों तक हवा में रहने के कारण मंद हवा भी उसे सैकड़ों मीटर दूर ले जाती है।

स्वयं जाँचिए: डेंडेलियन या मदार का एक बीज रोमों सहित और दूसरा रोम तोड़कर एक ही ऊँचाई से गिराइए। रोमरहित बीज हर बार पहले नीचे पहुँचेगा — द्रव्यमान लगभग वही रहा, अतः अंतर क्षेत्रफल से ही आया।
क्या आप जानते हैं? प्रकीर्णन इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि जनक के ठीक नीचे अंकुरित होने वाला बीज प्रकाश, जल और खनिजों के लिए जनक से ही स्पर्धा करेगा। वायु द्वारा प्रकीर्णन, तथा जल और जंतुओं द्वारा प्रकीर्णन, वे उपाय हैं जिनसे पौधा अपनी संतति को ऐसी भूमि पर भेजता है जिस पर वह पहले से नहीं है।
प्र3.
एक कृषक मक्का की दो किस्मों को एक-दूसरे के पास बोता है परंतु देखता है कि बीज तभी बनते हैं जब एक किस्म का परागकण दूसरी किस्म के वर्तिकाग्र तक पहुँचता है। यह किस प्रकार का परागण है?
उत्तर

पर-परागण। परागकण एक पौधे के पुष्प के परागकोश से दूसरे पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र तक जा रहा है, और वह भी उसी प्रकार के पौधे का — यही अध्याय में दी गई पर-परागण की परिभाषा है।

स्व-परागण — वही पुष्प या वही पौधा एक पौधा पर-परागण — दो भिन्न पौधे किस्म 1 किस्म 2 परागकण दो पौधों के बीच जाता है
चित्र 11.13 के अनुसार स्व-परागण और पर-परागण। कृषक के खेत में परागकण को एक किस्म छोड़कर दूसरी किस्म के वर्तिकाग्र पर उतरना पड़ता है, अतः केवल दाईं ओर वाला मार्ग ही बीज देता है।
बीज केवल इसी दिशा में क्यों बनते हैं: कृषक का अवलोकन कहता है कि उसी किस्म के वर्तिकाग्र पर उतरा परागकण कुछ नहीं बनाता। यह स्व-अयोग्यता (self-incompatibility) है — पौधा अपने ही परागकण को पहचान लेता है और उसे वर्तिका में नलिका नहीं उगाने देता। केवल आनुवंशिक रूप से भिन्न पौधे का परागकण स्वीकार होता है। प्रकृति इस युक्ति का व्यापक उपयोग पर-परागण को बाध्य करने के लिए करती है, क्योंकि पर-परागण दो जनकों के लक्षण मिलाता है और इस प्रकार विभिन्नता बनाता रहता है।
संकेत: मक्का वैसे भी प्राकृतिक रूप से पर-परागित है। उसके नर पुष्प पौधे के शीर्ष पर लगे मंजरी (टैसल) में होते हैं और मादा पुष्प नीचे भुट्टे में, जिनकी लंबी रेशमी वर्तिकाएँ बाहर लटकती हैं। मंजरी से झड़ा परागकण वायु से उड़ता है और उसका बड़ा भाग पड़ोसी पौधों की रेशमी वर्तिकाओं पर उतरता है — इसीलिए पास-पास बोई गई कृषक की दोनों किस्में एक-दूसरे का परागण कर देती हैं।
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