कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 11 जिज्ञासा-सूत्र के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
शिशु का जैविक लिंग निर्धारण किस प्रकार होता है? अब तक आपने सीखा है कि प्रत्येक व्यक्ति में दो लिंग गुणसूत्र होते हैं। मादाओं में XX और नरों में XY गुणसूत्र होते हैं। माँ सदैव शिशु को X गुणसूत्र प्रदान करती है और पिता X (मादा — XX) अथवा Y (नर — XY) गुणसूत्र प्रदान करता है। उपर्युक्त जानकारी से क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि शिशु के लिंग का निर्धारण कौन करता है?
उत्तर

पिता — अधिक ठीक कहें तो यह कि उसके दो प्रकार के शुक्राणुओं में से कौन-सा शुक्राणु अंडाणु को निषेचित करता है। माँ का इस पर कोई प्रभाव नहीं होता।

माँ XX है → अर्धसूत्री विभाजन से बने सभी अंडाणुओं में X
पिता XY है → अर्धसूत्री विभाजन से दो प्रकार के शुक्राणु: आधे में X, आधे में Y
शुक्राणु में Xशुक्राणु में Y
अंडाणु में XXX → बालिकाXY → बालक

चूँकि दोनों प्रकार के शुक्राणु बराबर संख्या में बनते हैं, इसलिए हर बार अपेक्षित संभावना 50% बालिका और 50% बालक होती है — और हर बार का निषेचन पिछले से स्वतंत्र होता है, ठीक जैसे सिक्के का नया उछाल।

माँ यह क्यों तय नहीं कर सकती: उसके पास देने के लिए Y गुणसूत्र है ही नहीं। वह जो भी अंडाणु बनाती है उसमें X ही होता है, क्योंकि XX कोशिका में अर्धसूत्री विभाजन प्रत्येक युग्मक में X ही रख सकता है। अतः शिशु का लिंग पूर्णतः इस बात से तय होता है कि कौन-सा शुक्राणु पहले पहुँचा — और यह संयोग की बात है, किसी की इच्छा, आहार या प्रयास की नहीं।
यह क्यों महत्त्वपूर्ण है: अनेक परिवारों में आज भी शिशु के लिंग के लिए स्त्री को दोषी ठहराया जाता है। यह मान्यता जैविक दृष्टि से सर्वथा गलत है। इसी विषय पर अध्याय का आगे का अनुभाग भी साथ में पढ़ने योग्य है — किसी विशेष लिंग की वरीयता से प्रेरित स्वयं चयनित गर्भपात समाज के लिंगानुपात को बिगाड़ देता है, इसीलिए भारत में प्रसव-पूर्व लिंग का पता लगाना कानूनी रूप से पूर्णतः प्रतिबंधित है
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