प्र1.
बाह्य निषेचन करने वाले जंतु सामान्यतः आंतरिक निषेचन करने वाले जंतुओं की तुलना में अधिक अंडे क्यों देते हैं?
उत्तर
क्योंकि बाह्य निषेचन में किसी एक अंडे के निषेचित होकर बड़े हो जाने की संभावना बहुत कम है, अतः अंडों की संख्या इतनी बड़ी होनी चाहिए कि उस कमी की भरपाई हो सके।
जीवित बचने वाली अपेक्षित संतति = N × p
N = दिए गए अंडे, p = किसी एक अंडे के निषेचित और जीवित रहने की प्रायिकता
बाह्य (मेंढक): N = एक बार में 5,000 – 50,000, उत्तरजीविता कम
आंतरिक (पक्षी): N = एक बार में 1 – 15, उत्तरजीविता मध्यम से उच्च (तालिका 11.4)
N = दिए गए अंडे, p = किसी एक अंडे के निषेचित और जीवित रहने की प्रायिकता
बाह्य (मेंढक): N = एक बार में 5,000 – 50,000, उत्तरजीविता कम
आंतरिक (पक्षी): N = एक बार में 1 – 15, उत्तरजीविता मध्यम से उच्च (तालिका 11.4)
बाह्य निषेचन में p को तीन अलग-अलग हानियाँ नीचे खींच देती हैं —
- युग्मक खुले जल में मुक्त होते हैं। नर से निकलते ही शुक्राणु तनु हो जाते हैं और जल-धाराएँ शुक्राणुओं तथा अंडों को एक-दूसरे से दूर बहा ले जाती हैं। अनेक अंडों तक कोई शुक्राणु पहुँचता ही नहीं।
- अंडे असुरक्षित पड़े रहते हैं। जैसा अध्याय कहता है, कई अंडे जल-धाराओं द्वारा नष्ट हो जाते हैं अथवा अन्य जंतुओं द्वारा खा लिए जाते हैं। उन्हें कोई आश्रय नहीं मिलता।
- संतति अकेली होती है। न कोई कवच, न गर्भाशय, न रखवाली करता जनक; स्फुटन के क्षण से ही लार्वा को अपना भोजन स्वयं खोजना पड़ता है।
माँ हर अंडे को अधिक क्यों नहीं दे सकती: बजट निश्चित है। अध्याय इसे स्पष्ट कहता है — माँ का शरीर इतने अंडों के लिए पर्याप्त मात्रा में पीतक नहीं दे सकता। अतः युक्ति यह है कि पीतक उतना ही हो जिससे एक लार्वा बन सके, जो स्फुटित होकर बाहर निकले और फिर सड़े खाद्य पदार्थों तथा खाद जैसे कार्बनिक अपशिष्टों को खाकर बढ़े और अंत में रूपांतरित होकर वयस्क बने — जैसा चित्र 11.17 की तितली में और मेंढक में होता है। आंतरिक निषेचन इस चयन को उलट देता है: अंडे बहुत कम, पर प्रत्येक में या तो पर्याप्त पीतक (सरीसृप और पक्षी में) या माँ के शरीर से सीधी आपूर्ति (स्तनधारी में), जिससे भली प्रकार विकसित बच्चा बने।
संकेत: इसे एक ही राशि खर्च करने के दो ढंग मानिए। बाह्य निषेचन करने वाले उसे अनेक सस्ते अंडों पर लगाते हैं; आंतरिक निषेचन करने वाले थोड़े महँगे अंडों पर। कोई श्रेष्ठ नहीं है — प्रत्येक अपने पर्यावास के अनुकूल है।