कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 11 पाठ्य प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
पुष्प भी पादपों के सौंदर्य में वृद्धि करते हैं क्योंकि वे रंगीन और/अथवा सुगंधित होते हैं। पुष्पों की ये विशेषताएँ जनन के लिए किस प्रकार उपयोगी हैं?
उत्तर

रंग और सुगंध सजावट नहीं, विज्ञापन हैं। ये उन जंतुओं को बुलाते हैं जो परागकण एक पुष्प से दूसरे तक ले जाते हैं, और उस ढुलाई के बिना परागकण वहीं पड़ा रह जाता जहाँ बना था।

  • रंग दूर से दिखाई देता है और मधुमक्खी, तितली या शकरखोरा को बता देता है कि यहाँ भोजन है।
  • सुगंध वहाँ काम करती है जहाँ रंग नहीं कर सकता — रात में और घनी पत्तियों के भीतर। गंध के अणु वायु के साथ चलते हैं और पतंगा उन्हें कई मीटर दूर से भी पहचान लेता है।
  • मकरंद दलों के आधार पर पुरस्कार है। कीट मकरंद के लिए आता है और शरीर पर परागकण चिपकाकर जाता है।
पौधे को वाहक के लिए कीमत क्यों चुकानी पड़ती है: पौधा स्थिर है। उसके नर युग्मक परागकोश में रखे परागकणों के भीतर हैं और मादा युग्मक अंडाशय के बीजांडों में, प्रायः किसी दूसरे पौधे पर। परागकण को कोई न कोई हिलाकर ले जाएगा ही। या तो वायु यह काम निःशुल्क करे — और तब पौधे को प्रति पुष्प पाँच से दस लाख परागकण बनाने पड़ते हैं क्योंकि वायु की ढुलाई इतनी अपव्ययी है — या कोई जंतु यह काम सटीकता से करे और पौधा उसे मकरंद में भुगतान करे। रंग और सुगंध उसी सटीकता की कीमत हैं।
संकेत: यह तर्क उलटी दिशा में भी चलता है। गेहूँ, मक्का और चावल के पुष्प छोटे, हरे और गंधहीन होते हैं — क्योंकि उनका परागण वायु से होता है, अतः दल और मकरंद पर खर्च करने से उन्हें कुछ नहीं मिलता।
प्र2.
कुछ पादपों पर पुष्पों और उनकी कलियों का अन्वेषण कीजिए। अपने अवलोकनों को अपनी नोटबुक में लिखिए। क्या आप को दोनों में पतले, चपटे, हरे आवरण और रंगीन प्रवर्ध दिखाई देते हैं?
उत्तर

हाँ — दोनों कली में भी हैं और खिले पुष्प में भी, पर उनकी व्यवस्था अलग होती है।

भागकली मेंखिले पुष्प में
पतला, चपटा, हरा आवरण — बाह्यदलसबसे बाहर, बाकी सब पर कसकर लिपटा हुआदलों के नीचे फैला हुआ, फिर भी सबसे बाहरी चक्र
रंगीन प्रवर्ध — दलबाह्यदलों के नीचे मुड़े और छिपे हुए; प्रायः रंग की एक झलक भर दिखती हैपूरी तरह फैले और प्रदर्शित
यह क्रम कभी क्यों नहीं बदलता: पुष्प चक्रों के एक समुच्चय के रूप में बनता है, एक के भीतर दूसरा — सबसे बाहर बाह्यदल, फिर दल, फिर पुंकेसर और बीच में स्त्रीकेसर। कली वही पुष्प है, बस चक्रों के फैलने से पहले। अतः बाहर हरा आवरण और उसके नीचे छिपा रंग — यही आपको हर उस कली में मिलेगा जिसे आप खोलेंगे।
यह भी कीजिए: एक ही गुड़हल या गुलाब के पौधे पर विभिन्न आयु की कलियाँ खोलकर एक पंक्ति में रखिए। दिनों की प्रतीक्षा किए बिना ही आपको पुष्प के खिलने का चरणबद्ध चित्र मिल जाएगा।
प्र3.
क्या आप सोचते हैं कि बाह्यदल, कली अवस्था में तथा पुष्प के खिलने पर उनके अन्य भागों की रक्षा करते हैं?
उत्तर

हाँ। बाह्यदल सबसे बाहरी चक्र हैं और कली अवस्था में वे दलों, पुंकेसरों और स्त्रीकेसर को पूरी तरह घेरे रहते हैं।

  • सूखने से बचाव — भीतर के कोमल भाग तैयार होने तक धूप और वायु से सुरक्षित रहते हैं।
  • वर्षा से बचाव — जल परागकोश के भीतर परागकणों को झड़ने से पहले ही नष्ट कर देता।
  • कीटों से बचाव — कली खुली होती तो कुतरने वाले कीट विकसित होते बीजांडों तक पहुँच जाते।

पुष्प के खिलने के बाद भी अधिकांश पुष्पों में बाह्यदल गिरते नहीं। वे दलों के नीचे बने रहते हैं और पूरे पुष्प को वृंत पर थामे रखते हैं, अर्थात नीचे से सहारा देते हैं।

बाह्यदल हरे और दल हरे क्यों नहीं: बाह्यदलों में पर्णहरित होता है और वे कुछ प्रकाश संश्लेषण भी करते हैं, जो ऐसे रक्षात्मक आवरण के लिए उपयोगी है जिसे दृढ़ और आत्मनिर्भर होना है। दलों में इसके स्थान पर दूसरे वर्णक होते हैं, जिनसे वे परागणकारियों को दिखते हैं पर भोजन नहीं बना सकते। रंग का यह अंतर सीधे कार्य के अंतर से निकलता है।
क्या आप जानते हैं? टमाटर या बैंगन पर आज भी बाह्यदल हरी ‘टोपी’ के रूप में लगे दिखते हैं। फल पका हुआ अंडाशय है, और कली की रक्षा करने वाले वही बाह्यदल अब भी उसके आधार पर जुड़े हुए हैं।
प्र4.
क्या सभी पुष्पों में ये दोनों भाग होते हैं? पुष्प के अन्य भाग कौन-कौन से हैं?
उत्तर

नहीं, सभी पुष्पों में दोनों नहीं होते। एक संपूर्ण पुष्प में चार भाग होते हैं — बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर — पर अनेक पुष्पों में इनमें से एक या अधिक अनुपस्थित होते हैं।

  • गेहूँ, मक्का और चावल जैसी घासों में आकर्षक दल होते ही नहीं; वायु-परागित होने के कारण उनसे उन्हें कोई लाभ न मिलता।
  • कुछ पुष्पों में बाह्यदल और दल युग्मित होते हैं, या एक जैसे दिखते हैं और अलग पहचाने नहीं जाते।
  • पपीते में नर पुष्प एक पेड़ पर और मादा पुष्प दूसरे पेड़ पर लगते हैं — नर पुष्पों में स्त्रीकेसर नहीं होता और मादा पुष्पों में पुंकेसर नहीं।

अन्य दो भाग जननीय हैं —

भागउपभागकार्य
पुंकेसर — नर भागतंतु और परागकोशपरागकोश परागकण बनाता है, जिनमें नर युग्मक होते हैं
स्त्रीकेसर — मादा भागवर्तिकाग्र, वर्तिका और अंडाशयवर्तिकाग्र परागकण ग्रहण करता है; वर्तिका अंडाशय तक जाने वाली नली है; अंडाशय में बीजांड होते हैं, प्रत्येक में एक अंडकोशिका
परागकोश तंतु बाह्यदल वर्तिकाग्र वर्तिका अंडाशय बीजांड दल
चित्र 11.10 और चित्र 11.11 के अनुसार संपूर्ण पुष्प के चार चक्र — सबसे बाहर बाह्यदल, फिर दल, फिर पुंकेसर (तंतु + परागकोश) और बीच में स्त्रीकेसर (वर्तिकाग्र, वर्तिका, बीजांडयुक्त अंडाशय)।
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