पहले पाँचों जीवों को स्थान दीजिए, फिर हर भाग का उत्तर।
(i) कौन-सा जीव स्पष्ट रूप से जगत फंजाई में है, और समर्थन में एक अवलोकन
जीव Q। समर्थक अवलोकन: इसमें कोशिका भित्ति है परंतु पर्णहरित नहीं और यह मृत कार्बनिक पदार्थ पर वृद्धि करता है — अर्थात मृतपोषी, अवशोषण द्वारा पोषण। कोशिका भित्ति युक्त बहुकोशिकीय जीव या तो प्लांटी होगा या फंजाई; पर्णहरित का अभाव प्लांटी को बाहर कर देता है। तंतुमय काया भी अनुभाग 12.6.3 में वर्णित कवक जाल से मेल खाती है।
(ii) कौन-सा जीव जगत मोनेरा में जाएगा, और संगत ठहराने वाली विशेषता
जीव P। संगत ठहराने वाली विशेषता: इसमें वास्तविक केंद्रक नहीं है — यह पूर्वकेंद्रकी है, और चित्र 12.5 के पहले ही विभाजन के अनुसार पूर्वकेंद्रकी जीव मोनेरा हैं। उच्च लवणता और तापमान में इसका जीवित रहना भी इसी से मेल खाता है, क्योंकि जीवाणु और आर्किया उष्ण स्रोतों तथा अन्य चरम परिस्थितियों में पाए जाते हैं जहाँ अधिकांश जीव जीवित नहीं रह सकते।
(iii) R और Q को अलग करने वाले मानदंड, जबकि दोनों सुकेंद्रकी हैं
सुकेंद्रकी होना केवल यह बताता है कि चित्र 12.5 की कौन-सी शाखा लेनी है। संगठन का स्तर इन्हें तुरंत अलग कर देता है, और पोषण की विधि तथा भित्ति का पदार्थ इसकी पुष्टि करते हैं।
(iv) S का वर्गीकरण केवल पोषण की विधि से क्यों नहीं हो सकता
क्योंकि "विषमपोषी" पाँच में से तीन जगतों में साझा है — एनिमेलिया, फंजाई तथा अनेक प्रोटिस्टा और मोनेरा। यह जान लेने से कि S भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर है, संभावनाएँ लगभग घटती ही नहीं। S को वास्तव में उसकी संरचना रखती है: सुविभेदित ऊतकों सहित बहुकोशिकीय (अतः प्रोटिस्टा या मोनेरा नहीं), वास्तविक ऊतक और अंग सहित तथा कोशिका भित्ति का कोई संकेत नहीं (अतः फंजाई नहीं, जो कवक जाल से अवशोषण करते हैं), और सबसे बढ़कर मेरुदंड — जो इसे केवल एनिमेलिया में नहीं, कशेरुकी वर्ग में रखता है। जीवन की प्रारंभिक अवस्था में जलीय श्वसन इसे और सँकरा करके उभयचर तक ले जाता है। अकेले प्रयुक्त पोषण एक कमज़ोर लक्षण है; यहाँ सूचना संरचना में है।
(v) T में कौन-सी मूलभूत विशेषता नहीं है और इससे क्या पता चलता है
T में कोशिकीय संगठन नहीं है। यह अकोशिकीय है — कोशिका झिल्ली, कोशिकाद्रव्य, कोशिकांग और किसी भी उपापचय के बिना केवल आनुवंशिक पदार्थ, और परपोषी के बाहर निष्क्रिय। पाँच जगत प्रणाली का हर मानदंड (कोशिका प्रकार, संगठन का स्तर, कोशिका संरचना, पोषण की विधि, पारिस्थितिकीय भूमिका) कोशिकाओं के विषय में प्रश्न है, अतः इनमें से एक भी T से पूछा ही नहीं जा सकता।
इससे क्या पता चलता है: कोई भी वर्गीकरण प्रणाली उतना ही छाँट सकती है जितना उसके मानदंड माप सकते हैं। प्रकृति सतत है और सीमावर्ती उदाहरण पैदा करती रहती है; डिब्बों से बनी प्रणाली में कुछ न कुछ सदा किसी रेखा पर बैठा रहेगा। ऐसे बेमेल लज्जा का कारण नहीं हैं — इतिहास में हर बेमेल ने प्रणाली को आगे बढ़ाया है (अमीबा → प्रोटिस्टा, जीवाणु → मोनेरा, कवक → अपना जगत, डीएनए आँकड़े → तीन डोमेन)। वर्गीकरण एक कार्यसाधक उपकरण है जिसे प्रमाण बढ़ने पर संशोधित किया जाता है, प्रकृति के विषय में अंतिम कथन नहीं।
(vi) यदि वर्गीकरण केवल पर्यावास के आधार पर होता
तब जीव इस आधार पर समूहित होते कि वे कहाँ रहते हैं, न कि इस आधार पर कि वे हैं क्या। इसी अध्ययन से —
- R (एक प्रोटिस्ट) और S (एक कशेरुकी) एक साथ आ जाते क्योंकि दोनों अलवणीय जल के तालाब से एकत्र किए गए थे — एक अकेली सुकेंद्रकी कोशिका मेरुदंड वाले जंतु के साथ।
- P और T दोनों "जंतुओं के पाचन तंत्र में पाए गए" के रूप में एक समूह में रखे जा सकते थे, अर्थात एक जीवित पूर्वकेंद्रकी जीव एक निर्जीव विषाणु के साथ।
- Q (सड़ी लकड़ियों के पास की नम मिट्टी) उसी मिट्टी में मिलने वाले केंचुओं, कीटों और मॉस के साथ समूहित होता, जबकि ये चार अलग-अलग जगतों के हैं।
वैज्ञानिक परिणाम:
- असंबद्ध जीव संबंधी मान लिए जाते और निकट संबंधी अलग हो जाते — व्हेल मछलियों के साथ आ जाती और शेष स्तनधारियों से अलग हो जाती।
- प्रणाली का पूर्वानुमान मूल्य समाप्त हो जाता। यह जान लेने से कि कोई जीव "जलीय" है, उसकी कोशिकाओं, पोषण या जनन के विषय में कुछ भी पता नहीं चलता।
- जीव के स्थान बदलते ही वर्गीकरण टूट जाता। मेंढक टैडपोल अवस्था में जलीय और वयस्क अवस्था में स्थलीय है; प्रवासी पक्षी वर्ष में दो बार समूह बदलता।
- विकासात्मक सूचना नष्ट हो जाती — जबकि वर्गीकरण का पूरा उद्देश्य ही यह दिखाना है कि जीव आपस में किस प्रकार संबंधित हैं।
इसीलिए अरस्तू की पर्यावास आधारित प्रणाली, जिसने जीवों को भूमि, जल और वायु के अनुसार समूहित किया था, छोड़नी पड़ी:
वह मुख्यतः सरलता से दिखाई देने वाली बाहरी विशेषताओं पर आधारित थी।
(vii) नया जीव — फंजाई या एनिमेलिया?
इसे फंजाई में रखना चाहिए। जीव बहुकोशिकीय और सुकेंद्रकी है, उसमें पर्णहरित नहीं है और वह बाहर से किसी परपोषी से पोषक तत्व अवशोषित करता है।
निर्णायक तर्क: केवल विषमपोषिता फंजाई और एनिमेलिया को अलग नहीं कर सकती — दोनों भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर हैं। अंतर विधि का है। कवक शरीर के बाहर पाचन करके महीन तंतुओं से उत्पाद अवशोषित करते हैं; अध्याय यह सीधे कहता है और यह भी जोड़ता है कि कुछ कवक परजीवी के रूप में रहते हैं और पादपों तथा जंतुओं में रोग उत्पन्न करते हैं — ठीक वही जीवन शैली जो यहाँ वर्णित है। जंतु भोजन को पहले शरीर के भीतर लेते हैं। अतः बाह्य अवशोषण इसे फंजाई में रखता है।
पुष्टि के लिए और क्या देखा जाए: काइटिन की कोशिका भित्ति और तंतुमय कवक जाल मिलते ही निर्णय निर्विवाद हो जाएगा, क्योंकि जंतु कोशिका में कोई कोशिका भित्ति होती ही नहीं। यदि पता चले कि जीव में कोशिका भित्ति नहीं है और वह घुले पोषक अवशोषित करने के बजाय ऊतक निगलता है, तो उत्तर पलटकर एनिमेलिया हो जाएगा — जैसे परजीवी चपटा कृमि अंकुश और चूषक से परपोषी से जुड़कर पोषण लेता है, परंतु है वह जंतु ही।