कक्षा ९ विज्ञान अध्याय 12 अभ्यास प्रश्न के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-08

प्र1.
मीना और हरि ने अपने उद्यान में एक जंतु देखा। हरि ने उसे कीट कहा जबकि मीना ने कहा कि वह केंचुआ है। उस सही विकल्प को चुनिए जो यह पुष्टि करता है कि वह एक कीट है। (i) द्विपार्श्व सममिति की काया (ii) संधित पाद वाली काया (iii) बेलनाकार काया (iv) कम खंडीभवन वाली काया
उत्तर

(ii) संधित पाद वाली काया।

क्यों: प्रश्न उस विशेषता को माँगता है जो पुष्टि करे कि जंतु कीट है — अर्थात वह कीट में हो और केंचुए में न हो। हर विकल्प को दोनों पर परखिए।
विकल्पकेंचुआ (ऐनेलिडा)कीट (आर्थ्रोपोडा)क्या यह निर्णय करता है?
(i) द्विपार्श्व सममिति की कायाहाँहाँनहीं — दोनों में है
(ii) संधित पाद वाली कायापाद होते ही नहींतीन जोड़ी संधित पादहाँ
(iii) बेलनाकार कायाहाँ — बेलनाकार और खंडयुक्तयह निर्धारक लक्षण नहींनहीं — यह तो उल्टे केंचुए की ओर संकेत करता है
(iv) कम खंडीभवन वाली कायाअत्यधिक खंडयुक्तयह भी खंडयुक्त (सिर, वक्ष, उदर)नहीं — दोनों खंडयुक्त हैं
संधित उपांग आर्थ्रोपोडा की निर्धारक संरचनात्मक विशेषता है — नाम ही यह कहता है: आर्थ्रो अर्थात संधित और पोडा अर्थात पाद। केंचुए में एक भी नहीं होता।
संकेत: "कौन-सा विकल्प पुष्टि करता है" वाले प्रश्न में सदा वही लक्षण खोजिए जो एक में उपस्थित और दूसरे में अनुपस्थित हो। जो लक्षण दोनों में हो, वह चाहे कितना ही सत्य हो, कभी पुष्टि नहीं कर सकता।
प्र2.
स्पंज, जंतु जगत की सबसे सरल शरीर-संरचना वाले जीवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके शरीर में वास्तविक ऊतक और अंग नहीं होते हैं। स्पंज कोशिकाओं की कौन-सी विशेषता उसे जंतु जगत के अंतर्गत वर्गीकृत करने का आधार है? (i) माइटोकॉन्ड्रिया की अनुपस्थिति (ii) प्रकाश संश्लेषण करने की क्षमता (iii) कोशिका झिल्ली की उपस्थिति (iv) कोशिका भित्ति की उपस्थिति
उत्तर

(iii) कोशिका झिल्ली की उपस्थिति। अभिप्राय यह है कि स्पंज की कोशिका के चारों ओर कोशिका झिल्ली होती है, कोशिका भित्ति नहीं — और चित्र 12.5 में कोशिका भित्ति का अभाव ही वह विभाजन है जो एनिमेलिया तक ले जाता है।

शेष तीन गलत क्यों हैं:
  • (i) माइटोकॉन्ड्रिया की अनुपस्थिति — तथ्य ही गलत है। स्पंज सुकेंद्रकी है और उसकी कोशिकाओं में माइटोकॉन्ड्रिया होते हैं; इनके बिना कोशिका ऊर्जा मुक्त ही नहीं कर सकती।
  • (ii) प्रकाश संश्लेषण करने की क्षमता — यह तो स्पंज को एनिमेलिया से बाहर कर देती। जंतु विषमपोषी होते हैं; स्पंज जल की धारा से भोजन कण खींचता है।
  • (iv) कोशिका भित्ति की उपस्थिति — कोशिका भित्ति उसे प्लांटी या फंजाई में रखती, एनिमेलिया में नहीं।
यह प्रश्न सोचने योग्य क्यों है: स्पंज एक स्थान पर स्थिर रहता है, उसमें ऊतक नहीं, अंग नहीं, मुख नहीं, तंत्रिकाएँ नहीं — जंतु पहचानने के हमारे सारे सामान्य आधार गायब हैं। अतः वर्गीकरण को चित्र 12.5 के गहरे मानदंड पर लौटना पड़ता है: जो बहुकोशिकीय सुकेंद्रकी जीव कोशिका भित्ति रहित हो और भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर हो, वह जंतु है — चाहे दिखने में कितना ही पादप जैसा क्यों न हो।
प्र3.
अपने आस-पास के वातावरण में दो अलग-अलग जीवों का अवलोकन कीजिए। उनकी कौन-सी विशेषताएँ आपको उनमें अंतर करने में सहायता करती हैं? ये विशेषताएँ किस प्रकार से उन्हें भिन्न समूहों में रखने में सहायता प्रदान करती हैं?
उत्तर

दो ऐसे जीव लीजिए जो लगभग सभी को मिल जाएँगे — कौआ और बगीचे की छिपकली — और उन्हीं लक्षणों पर तुलना कीजिए जिनका उपयोग अध्याय करता है।

विशेषताकौआछिपकलीयह क्या तय करती है
देहावरणपर (feathers)शुष्क शल्कपक्षी बनाम सरीसृप
अग्रपादपंखों में रूपांतरितचलने वाले पादगति की विधि
जबड़ेदाँतरहित चोंचदाँतयुक्त जबड़ेभोजन ग्रहण की विधि
शरीर का तापनियततापी (स्थिर)अनियततापी — धूप सेंककर शरीर गर्म करती हैपक्षी बनाम सरीसृप
जननकठोर कवच वाले अंडे, घोंसले में, चूजों की देखभालचर्मिल अंडे मिट्टी में दबाए, कोई देखभाल नहींजनन का प्रतिरूप
कशेरुक दंडउपस्थितउपस्थितसाझा — दोनों कशेरुकी हैं
ये विशेषताएँ समूहन कैसे करती हैं: वर्गीकरण उस स्तर को खोजता है जहाँ दो जीवों की समानता समाप्त हो जाती है।
  • दोनों बहुकोशिकीय, विषमपोषी, कोशिका भित्ति रहित सुकेंद्रकी हैं → दोनों एनिमेलिया में।
  • दोनों में कशेरुक दंड है → दोनों कॉर्डेटा, कशेरुकी
  • अब इनके रास्ते अलग होते हैं। अध्याय कहता है कि कशेरुकी जीवों को उनके पर्यावास उपयोग, देहावरण और जनन के व्यापक प्रतिरूप के आधार पर पाँच समूहों में बाँटा गया है। पर, चोंच, पंख और नियततापी होना कौए को पक्षी बनाते हैं; शुष्क शल्क, चलने वाले पाद और अनियततापी होना छिपकली को सरीसृप
अंतर यों ही कहीं भी प्रकट नहीं होते — वे एक विशेष स्तर पर प्रकट होते हैं, और वही स्तर वर्गीकरण है।
कॉपी के लिए नमूना उत्तर: "मैंने दीवार पर बैठा कौआ और नीम के तने पर छिपकली देखी। दोनों में कशेरुक दंड है, अतः दोनों कशेरुकी हैं। कौए में पर, पंख और चोंच है तथा वह घोंसले में कठोर कवच वाले अंडे देता है, इसलिए वह पक्षी है। छिपकली में शुष्क शल्क, चार चलने वाले पाद और दाँत हैं, और वह सुबह धूप सेंकती है क्योंकि अपना शरीर स्वयं गर्म नहीं रख सकती, इसलिए वह सरीसृप है।"
प्र4.
कोई वैज्ञानिक वर्गीकरण करने के लिए जाइलम और फ्लोएम की उपस्थिति की तुलना में कोशिकीय संगठन को अधिक मौलिक आधार बनाना किस प्रकार न्यायसंगत सिद्ध करता है।
उत्तर

क्योंकि कोशिकीय संगठन प्रत्येक सजीव पर लागू होता है, जबकि जाइलम और फ्लोएम केवल एक जगत के एक कोने पर। मानदंड तभी मौलिक कहलाता है जब वह पहले ही विभाजन में संपूर्ण जीवजगत को छाँट सके; जाइलम-फ्लोएम तो आरंभ ही नहीं कर सकते।

न्यायसंगति के बिंदु:
  • सार्वभौमिकता। हर जीव कोशिकाओं से बना है, अतः "पूर्वकेंद्रकी या सुकेंद्रकी?" और "एककोशिकीय या बहुकोशिकीय?" ये प्रश्न जीवाणु, अमीबा, मशरूम, मॉस, फर्न और बाघ — सबसे पूछे जा सकते हैं। "क्या इसमें जाइलम है?" जीवाणु, कवक या हाथी से पूछिए तो प्रश्न निरर्थक है — तीनों का उत्तर "नहीं" है, अतः यह कुछ भी अलग नहीं करता।
  • विभाजन का विस्तार। कोशिका प्रकार चित्र 12.5 के पहले ही विभाजन पर संपूर्ण जीवजगत को दो में बाँट देता है। संवहनी ऊतक केवल जगत प्लांटी को, और उसमें भी उसके पाँच में से दो वर्गों को बाँटता है।
  • गहराई। कोशिका में झिल्ली आबद्ध केंद्रक है या नहीं, यह जीवन की मूल वास्तुकला का अंतर है; अध्याय इसे निर्णायक मानता है। इसीलिए तो बेहतर सूक्ष्मदर्शियों से यह पता चलने पर कि अमीबा में वास्तविक केंद्रक है और जीवाणु में नहीं, जीवाणुओं को प्रोटिस्टा से निकालकर पृथक जगत मोनेरा में रखा गया।
  • विश्वसनीयता। कोशिकीय संगठन जीव के पूरे जीवन में स्थिर रहता है। किसी पौधे में संवहनी ऊतक कितना विकसित है, यह आयु और उगने की परिस्थितियों से बदल सकता है।
  • उपयोग का क्रम। यह कहना नहीं है कि जाइलम-फ्लोएम महत्त्वहीन हैं — वही तो टेरिडोफाइटा को ब्रायोफाइटा से अलग करते हैं। यह इस बात का दावा है कि पदानुक्रम में किस लक्षण का स्थान कहाँ है — व्यापक लक्षण ऊपर, विशेषीकृत लक्षण नीचे।
संकेत: सामान्य नियम यह है कि उच्च स्तर का अच्छा लक्षण वह है जो सार्वभौमिक, गहरा और स्थिर हो। किसी भी प्रस्तावित मानदंड को इन तीन शब्दों पर परखिए और प्रायः तुरंत दिख जाएगा कि पदानुक्रम में उसका स्थान कहाँ है।
प्र5.
यदि आपको एक बिना नाम वाली स्लाइड पर ऐसा एककोशिकीय जीव मिले जिसमें सुस्पष्ट केंद्रक तथा अनेक पक्ष्माभ हों तो उसके किस समूह का सदस्य होने की सर्वाधिक संभावना है? कारण बताइए।
उत्तर

जगत प्रोटिस्टा — और सर्वाधिक संभावना यह है कि वह पैरामीशियम जैसा पक्ष्माभी जीव है।

कारण, चित्र 12.5 के क्रम में:
  1. सुस्पष्ट केंद्रक का अर्थ है कि कोशिका सुकेंद्रकी है। इससे मोनेरा तुरंत बाहर हो जाता है, जिसके सदस्य पूर्वकेंद्रकी होते हैं और जिनका केंद्रक आद्य तथा झिल्ली रहित होता है।
  2. एककोशिकीय होने का अर्थ है संगठन का स्तर एककोशिकीय है। इससे फंजाई, प्लांटी और एनिमेलिया बाहर हो जाते हैं, जिन्हें अध्याय बहुकोशिकीय बताता है।
  3. एककोशिकीय सुकेंद्रकी जीव, परिभाषा से ही, प्रोटिस्टा है।
  4. अनेक पक्ष्माभ इसकी पुष्टि करते हैं। पक्ष्माभ तैरने और भोजन कणों को कोशिका के भीतर बुहारने के अंग हैं — ठीक वही उपकरण जो पैरामीशियम के पास है, जो चित्र 12.7 में दिखाए गए प्रोटिस्टों में से एक है। जीवाणुओं में कशाभ हो सकते हैं परंतु इस प्रकार का पक्ष्माभी आवरण नहीं, और न कोई कवक या पादप कोशिका तैरती है।
एक ईमानदार सावधानी: यीस्ट भी एककोशिकीय सुकेंद्रकी है, फिर भी अध्याय उसे फंजाई में रखता है क्योंकि उसकी कोशिका भित्ति काइटिन की बनी है। अतः केवल "एककोशिकीय सुकेंद्रकी" पूर्णतः निर्भ्रांत नहीं है। यहाँ पक्ष्माभ निर्णय कर देते हैं — यीस्ट में पक्ष्माभ नहीं होते और वह तैरता भी नहीं।
प्र6.
किसी पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन और स्थायित्व में जीवों की विविधता किस प्रकार योगदान देती है?
उत्तर

क्योंकि विविध पारितंत्र में अनेक जीव अतिव्यापी कार्य करते हैं, अतः एक के विफल होने पर दूसरा वही कार्य सँभाल लेता है — और क्योंकि ये कार्य स्वयं ऐसे बंद चक्र बनाते हैं जो पदार्थ को घुमाते रहते हैं।

1. हर भूमिका भरी रहती है और चक्र पूरे होते हैं।

  • पादप और सूक्ष्मदर्शीय शैवाल भोजन का उत्पादन करते हैं और ऑक्सीजन निर्मुक्त करते हैं — महासागरों के सूक्ष्मदर्शीय शैवाल अधिकांश ऑक्सीजन निर्मुक्त करते हैं जिसे हम श्वास से लेते हैं।
  • जंतु उपभोग करते हैं, और ऐसा करके किसी एक जनसंख्या को अनियंत्रित बढ़ने से रोकते हैं।
  • कवक और जीवाणु गिरी पत्तियों का अपघटन करते हैं और अपशिष्ट को खाद में बदलकर खनिज मृदा में लौटाते हैं। अध्याय के अनुसार इनके बिना मृत पौधों और जंतुओं का विघटन अत्यंत कम हो जाएगा, जिससे मृदा की उर्वरता और पारिस्थितिक संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
  • पक्षी, मधुमक्खियाँ और चमगादड़ परागण करते हैं; धनेश और अन्य जंतु बीज प्रकीर्णन

2. विविधता तंत्र को अतिरिक्त क्षमता देती है। यदि किसी घास मैदान के पौधों का परागण बीस कीट जातियाँ करती हों और कोई रोग तीन को समाप्त कर दे, तो परागण फिर भी होता रहेगा। यदि यह काम केवल एक जाति करती, तो बीज बनना पूरी तरह रुक जाता। यही तर्क अपघटकों, परभक्षियों और नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणुओं पर भी लागू होता है।

3. जटिल आहार जाल आघात सह लेते हैं। जिस परभक्षी के पास कई शिकार जातियाँ हों वह एक के दुर्लभ होने पर दूसरी की ओर मुड़ सकता है, अतः न परभक्षी गिरता है न शिकार। एकल कड़ी वाली शृंखला में यह छूट नहीं होती।

4. विविधता स्वयं आपदा से बचाती है। वर्ष 1999 के ओडिशा महाचक्रवात में जिन गाँवों में मैंग्रोव अधिक थे वहाँ कम विनाश हुआ; पश्चिमी घाट में वन विविधता क्यासानूर वन रोग के विरुद्ध जैविक अवरोधक की भाँति कार्य करती है, क्योंकि अनेक जंतु ऐसे परपोषी हैं जिनमें विषाणु प्रतिकृति नहीं कर सकता।

सामान्य सिद्धांत: स्थायित्व बहुल्यता और परस्पर जुड़ाव से आता है, किसी एक जाति के अपरिहार्य होने से नहीं। इसीलिए क्षति खतरनाक भी है — अध्याय की अपनी चेतावनी है कि जब कोई एक जाति विलुप्त होती है तो उस पर निर्भर अन्य जातियाँ भी घट सकती हैं और अंततः विलुप्त हो सकती हैं। हर क्षति एक धागा हटाती है, और कम धागों वाला जाल अधिक सरलता से फट जाता है।
प्र7.
यदि सभी एककोशिकीय जीवों को एक ही जगत में रख दिया जाए तो कौन-कौन सी समस्याएँ उत्पन्न होंगी?
उत्तर

तब पूर्णतः भिन्न कोशिका संरचना, भिन्न पोषण और भिन्न वंशक्रम वाले जीवों को एक ही डिब्बे में रखना पड़ेगा — और यही भूल इतिहास को दो बार सुधारनी पड़ी है।

  1. पूर्वकेंद्रकी और सुकेंद्रकी एक साथ आ जाएँगे। जीवाणु में झिल्ली आबद्ध केंद्रक नहीं, अमीबा में वास्तविक केंद्रक है। यह जीवजगत का सबसे गहरा विभाजन है। एक साथ रखने से यह विभाजन छिप जाता है। अध्याय स्वयं दर्ज करता है कि ठीक इसी कारण जीवाणुओं को निकालकर मोनेरा में रखा गया और वर्ष 1938 में चार जगत प्रणाली बनी।
  2. उत्पादक, उपभोक्ता और अपघटक मिल जाएँगे। प्रकाश संश्लेषी साइनोबैक्टीरिया, विषमपोषी अमीबा, अवशोषण से पोषण लेने वाला यीस्ट और दोनों के बीच बदलता यूग्लीना — सब एक ही जगत में होंगे और उनमें आमाप के अतिरिक्त कुछ भी साझा नहीं होगा।
  3. यह समूहन वंशक्रम के विषय में कुछ नहीं बताएगा। एककोशिकीय होना किसी पूर्वज से मिला साझा गुण नहीं है — यह बहुकोशिकता का अभाव है। किसी अभाव के आधार पर समूह बनाने से संबंध के विषय में कुछ पता नहीं चलता, जबकि वर्गीकरण का पूरा उद्देश्य ही यह है कि समान विशेषताएँ समान पूर्वज बताती हैं।
  4. बहुकोशिकीय अपवाद अनाथ हो जाएँगे। यीस्ट एककोशिकीय है परंतु काइटिन कोशिका भित्ति के कारण फंजाई में रखा जाता है। "एककोशिकीय जगत" यीस्ट को उन्हीं फफूँदों और मशरूमों से अलग कर देता जिनसे वह स्पष्टतः संबंधित है।
  5. इसका कोई पूर्वानुमान मूल्य नहीं होगा। यह जान लेने से कि जीव "एककोशिकीय" है, उसके विषय में और कुछ भी पता नहीं चलेगा — न कोशिका संरचना, न पोषण, न पारिस्थितिकीय भूमिका। अच्छा समूह वह है जिसकी सदस्यता अनेक अन्य तथ्यों का पूर्वानुमान दे।
ऐतिहासिक प्रमाण: यह प्रयोग वास्तव में किया जा चुका है। वर्ष 1866 की तीन जगत प्रणाली ने सारे सूक्ष्मजीवों को प्रोटिस्टा में डाल दिया था। बेहतर सूक्ष्मदर्शियों ने केंद्रक का अंतर दिखाया और प्रणाली को बाँटना पड़ा। और वर्ष 1977 में डीएनए प्रमाण ने पूर्वकेंद्रकियों को फिर बाँटा — बैक्टीरिया और आर्किया में। आमाप के आधार पर एक साथ रखने की भूल दो बार सुधारी जा चुकी है।
प्र8.
विषाणुओं के विषय में आप पहले की कक्षाओं में पढ़ चुके हैं। इन्हें पाँच-जगत में से किसी के भी अंतर्गत क्यों नहीं रखा गया? कारण बताइए।
उत्तर

क्योंकि पाँच जगत प्रणाली जीवों का वर्गीकरण उनकी कोशिकाओं से करती है — और विषाणु में कोशिका होती ही नहीं। चित्र 12.5 का हर मानदंड उस पर लगाया ही नहीं जा सकता।

पाँच जगत प्रणाली का मानदंडविषाणु में क्या है
कोशिका प्रकार — पूर्वकेंद्रकी या सुकेंद्रकीकोई नहीं। यह अकोशिकीय है: केवल आनुवंशिक पदार्थ और प्रोटीन आवरण
संगठन का स्तर — एककोशिकीय या बहुकोशिकीयकोई नहीं — यह कोशिकाओं से बना ही नहीं है
कोशिका संरचना — भित्ति उपस्थित या अनुपस्थितन कोशिका झिल्ली, न भित्ति, न कोशिकाद्रव्य, न कोशिकांग, न राइबोसोम
पोषण की विधि — स्वपोषी या विषमपोषीकोई नहीं। यह न भोजन लेता है, न बनाता है, न श्वसन करता है; इसमें उपापचय ही नहीं
पारिस्थितिकीय भूमिका — उत्पादक, उपभोक्ता, अपघटकइनमें से कोई नहीं
गहरा कारण — विषाणु "सजीव" की सीमा पर बैठा है। परपोषी कोशिका के बाहर यह पूर्णतः निष्क्रिय रहता है; इसे रसायन की भाँति क्रिस्टलित तक किया जा सकता है। परपोषी कोशिका के भीतर यह उसकी मशीनरी पर अधिकार करके गुणन कर लेता है। अर्थात इसमें जीवन का एक गुण है — प्रतिलिपित होने वाला आनुवंशिक पदार्थ — और शेष कोई नहीं: न कोशिका, न उपापचय, न वृद्धि, न उद्दीपन के प्रति अनुक्रिया, न स्वतंत्र जनन। जो प्रणाली कोशिकीय जीवों को छाँटने के लिए बनी है उसमें ऐसे जीव के लिए कोई स्थान नहीं जो केवल सशर्त रूप से सजीव हो।
प्र9.
यदि आप से पाँच वर्गीकरण में संशोधन करने के लिए कहा जाए तो क्या आप विषाणु को पृथक श्रेणी में रखेंगे या इस प्रणाली से बाहर रखेंगे? अपने उत्तर को उचित ठहराइए और स्पष्ट कीजिए कि यह वैज्ञानिक वर्गीकरण की विकासशील प्रकृति के संबंध में क्या संकेत देता है।
उत्तर

दोनों पक्ष रखे जा सकते हैं। अधिक सबल पक्ष यह है कि विषाणुओं को अपनी एक पृथक श्रेणी दी जाए — पाँच जगतों के साथ, उनके भीतर नहीं — और इसका कारण स्पष्ट कहा जाए।

पृथक श्रेणी के पक्ष में

  • विषाणु वास्तविक हैं, अत्यंत असंख्य हैं और जैविक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं — ये रोग उत्पन्न करते हैं, जीवों के बीच जीन का स्थानांतरण करते हैं और पूरी जनसंख्याओं को आकार देते हैं। इन्हें अनदेखा करने से जीवविज्ञान का एक बड़ा भाग अवर्गीकृत रह जाता है।
  • इनका आपस में वर्गीकरण भली प्रकार किया जा सकता है, अपने ही मानदंडों पर: आनुवंशिक पदार्थ का प्रकार (डीएनए या आरएनए), आवरण की आकृति, आवरणिका की उपस्थिति, और परपोषी। एक कार्यशील प्रणाली पहले से मौजूद है।
  • अलग श्रेणी देना ईमानदार समाधान है — इससे यह दर्ज होता है कि ये मूल रूप से भिन्न हैं, न कि उन्हें किसी ऐसे जगत में ठूँसा जाए जिसका कोई मानदंड इन पर लगता ही नहीं।

प्रणाली से बाहर रखने के पक्ष में

  • पाँच जगत कोशिकीय संगठन से परिभाषित हैं। किसी अकोशिकीय इकाई को भीतर लेने से पूरी प्रणाली का तर्क टूट जाएगा, और तर्क टूटते ही मानदंडों का अर्थ ही समाप्त हो जाता है।
  • विषाणु स्वयं कुछ नहीं कर सकता। यदि वह स्वतंत्र रूप से सजीव नहीं है, तो सजीवों के वर्गीकरण में उसका नाम लिखना सही दस्तावेज़ नहीं है।
मेरा पक्ष: पाँच जगतों को कोशिकीय मानदंडों पर कठोरता से परिभाषित रहने दीजिए और विषाणुओं को उनके साथ एक पृथक श्रेणी के रूप में जोड़िए, स्पष्ट रूप से "अकोशिकीय" लिखकर। इससे जगत आंतरिक रूप से संगत रहते हैं और विषाणुओं को भी उचित स्थान मिल जाता है। समस्या को अनदेखा कर देना वर्गीकरण नहीं है।
यह वैज्ञानिक वर्गीकरण के विषय में क्या संकेत देता है: कि यह एक कार्यसाधक उपकरण है, अंतिम सत्य नहीं। अध्याय ठीक यही कहता है: अरस्तू की प्रणाली अपने समय के लिए उपयुक्त थी, परंतु सूक्ष्मदर्शी जैसे नए साधनों और अभिरंजक जैसी तकनीकी प्रगति के कारण वैज्ञानिकों ने सूक्ष्मजीवों की खोज की; इन खोजों ने प्राकृतिक संसार की समझ बेहतर की और वर्गीकरण तदनुसार बदलता गया। अमीबा और पैरामीशियम के लिए दो जगत तीन बने; जीवाणुओं में वास्तविक केंद्रक न मिलने पर तीन चार बने; कवक पादप न निकलने पर चार पाँच बने; और फिर डीएनए प्रमाण ने वर्ष 1977 में तीन डोमेन पद्धति दी। जैविक वर्गीकरण निरंतर विवेचन और परिवर्तन की प्रक्रिया है — और विषाणु उसी क्रम का अगला अनसुलझा प्रकरण हैं।
प्र10.
विषाणुओं में सजीवों की भाँति आनुवंशिक पदार्थ होता है परंतु इनमें कोशिकीय संगठन नहीं होता। इनकी कौन-सी विशेषताएँ इन्हें पाँच जगत प्रणाली के अंतर्गत रखे जाने से रोकती हैं? इस बात से हमें वर्गीकरण प्रणालियों की कमियों के विषय में क्या ज्ञात होता है?
उत्तर

जो विशेषताएँ इन्हें रोकती हैं वही हैं जिन पर पूरी प्रणाली खड़ी है।

  1. कोशिकीय संगठन का अभाव। विषाणु अकोशिकीय है — प्रोटीन आवरण में आनुवंशिक पदार्थ, इससे अधिक कुछ नहीं। पाँच जगत प्रणाली का पहला ही प्रश्न, "पूर्वकेंद्रकी या सुकेंद्रकी?", उत्तर ही नहीं पा सकता।
  2. न कोशिका झिल्ली, न भित्ति, न कोशिकाद्रव्य, न कोशिकांग। अतः "कोशिका संरचना" वाले मानदंड के पास मापने को कुछ है ही नहीं।
  3. न उपापचय, न पोषण की कोई विधि। विषाणु न भोजन बनाता है न ग्रहण करता है, और श्वसन भी नहीं करता। वह न स्वपोषी है न विषमपोषी।
  4. स्वतंत्र जनन नहीं। यह केवल परपोषी कोशिका के भीतर, उसी की मशीनरी से गुणन कर सकता है। परपोषी के बाहर पूर्णतः निष्क्रिय रहता है।
  5. कोई पारिस्थितिकीय भूमिका उत्पादक / उपभोक्ता / अपघटक के अर्थ में नहीं।
वर्गीकरण प्रणालियों की कमियों के विषय में यह क्या बताता है:
  • हर प्रणाली उतनी ही व्यापक है जितने उसके मानदंड। पाँच जगत प्रणाली कोशिकाओं के विषय में प्रश्न पूछती है। जो कोशिकाओं से बना ही नहीं, वह सीधे छन कर बाहर निकल जाता है, चाहे कितना ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हो।
  • सीमावर्ती उदाहरण अपरिहार्य हैं। प्रकृति सतत है; वर्गीकरण डिब्बों से बना है। रेखा जहाँ भी खींचिए, कुछ न कुछ उस पर बैठा मिलेगा — विषाणु सजीव और निर्जीव की सीमा पर, यूग्लीना पादप और जंतु की सीमा पर, यीस्ट एककोशिकीय और फंजाई की सीमा पर।
  • बेमेल उदाहरण सूचना है, असफलता नहीं। हर पिछले बेमेल ने वास्तविक प्रगति करवाई है। अमीबा और पैरामीशियम दो जगतों में नहीं बैठे → प्रोटिस्टा जुड़ा। जीवाणु प्रोटिस्टा में नहीं बैठे → मोनेरा जुड़ा। कवक प्लांटी में नहीं बैठे → फंजाई अलग हुआ। विषाणु आज का बेमेल हैं, और वे हमारी वर्तमान समझ की सीमा को चिह्नित करते हैं।
  • वर्गीकरण एक उपकरण है, प्रकृति का नियम नहीं। इसे उपयोगिता से आँका जाता है, और प्रमाण बड़ा होने पर इसे संशोधित किया जाता है।
प्र11.
टेरिडोफाइट और ब्रायोफाइट दोनों में पुष्प और बीज नहीं पाए जाते हैं तब भी इन्हें अलग-अलग समूहों में रखा गया है। इनकी मुख्य विशेषताओं के आधार पर इस वर्गीकरण को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

इन्हें उससे अलग किया जाता है जो इनमें है, उससे नहीं जो दोनों में नहीं है — और निर्णायक लक्षण है संवहनी ऊतक की उपस्थिति। पुष्प और बीज का न होना एक साझा अभाव है, और अभाव कमज़ोर लक्षण होता है; वह ऐसे पौधों को भी एक साथ रख देता है जो आपस में बहुत भिन्न हों।

मुख्य विशेषताब्रायोफाइटा (मॉस, मार्केशिया)टेरिडोफाइटा (फर्न)
काय संगठनथोड़ा विभेदन; वास्तविक जड़, तना, पत्ती नहींवास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ
स्थिरीकरण की रचनामूलाभास — केवल जड़ जैसीजल और खनिज अवशोषित करने वाली वास्तविक जड़ें
संवहनी ऊतकअनुपस्थित — न जाइलम, न फ्लोएमउपस्थित — जाइलम और फ्लोएम (चित्र 12.11 ख)
जल और भोजन का परिवहनपूरी सतह से सीधे परिवेश सेसंवहनी ऊतक द्वारा पूरे पौधे में
आमाप और स्वभावछोटे, नम छायादार भूमि पर नीचे फैले हरे कालीनऊँचे और सीधे बढ़ सकते हैं; कुछ वृक्ष फर्न भी
जनन के लिए जलआवश्यकआवश्यक — यह वास्तव में साझा है
बीजअनुपस्थितअनुपस्थित
संवहनी ऊतक ही सही विभाजक रेखा क्यों है: यह अनेक लक्षणों में से एक लक्षण नहीं — यह आगे सब कुछ बदल देता है। जाइलम होने से पौधा जल को मृदा सतह से ऊपर उठा सकता है और उसका तना कठोर होता है, अतः वह ऊँचा बढ़कर पत्तियाँ भूमि से दूर रखकर प्रकाश तक पहुँच सकता है। फ्लोएम होने से वह उन जड़ों को भी भोजन दे सकता है जिन्हें सूर्य कभी नहीं मिलता। ब्रायोफाइट में दोनों नहीं, अतः वह स्थायी रूप से कुछ सेंटीमीटर और नम स्थानों तक सीमित है — इसीलिए उसे पादप जगत का उभयचर कहा जाता है। दोनों समूहों को जनन के लिए अब भी जल चाहिए, अतः जनन इन्हें अलग नहीं कर सकता; कायिक संरचना कर सकती है
सामान्य शिक्षा: वर्गीकरण साझा व्युत्पन्न लक्षण खोजता है — ऐसा कुछ जो समूह में हो और उसके पूर्वजों में न रहा हो। "पुष्प नहीं, बीज नहीं" तो सभी पादपों की पैतृक स्थिति है और शैवालों में भी है, अतः इससे कोई उपयोगी समूह नहीं बनता।
प्र12.
वर्गीकरण पदानुक्रम में वर्ग अथवा वंश में से किस समूह में सदस्यों की संख्या कम होती है परंतु वे अधिक विशेषताएँ साझा करते हैं? अपने उत्तर की व्याख्या कीजिए।
उत्तर

वंश। वर्ग की तुलना में वंश में सदस्य कहीं कम होते हैं और उसके सदस्य कहीं अधिक विशेषताएँ साझा करते हैं।

जगत → संघ → वर्ग → गण → कुल → वंश → जाति
वंश, वर्ग से चार स्तर नीचे है।
नीचे जाने पर: सदस्यों की संख्या घटती है; साझा विशेषताएँ बढ़ती हैं
ऐसा होना अनिवार्य क्यों है: पदानुक्रम समाहित है — प्रत्येक निम्नतर समूह अपने ऊपर वाले के पूरी तरह भीतर है। अतः वंश किसी कुल का छोटा भाग है, कुल किसी गण का, गण किसी वर्ग का। नीचे जाते-जाते सदस्यता घट ही सकती है। और समूह की परिभाषा उन्हीं विशेषताओं से बनती है जो उसके सदस्य साझा करते हैं, अतः छोटे और अधिक विशिष्ट समूह को बाँधने वाले साझा लक्षणों की सूची लंबी होती है।

चित्र 12.17 के बाघ से उदाहरण:

स्तरसमूहसदस्य क्या साझा करते हैंलगभग कितनी जातियाँ
वर्गमैमेलियारोम, स्तन ग्रंथियाँ, नियततापी होना — लगभग इतना हीकई हजार — चमगादड़, व्हेल, हाथी, चूहे, मनुष्य, बाघ
गणकार्निवोराइसके अतिरिक्त काटने-चीरने वाले विशेषीकृत दाँत और मांसाहारी स्वभावकुछ सौ
कुलफेलिडीइसके अतिरिक्त भीतर खींचे जा सकने वाले नखर, छोटा मुख, बिल्ली जैसी शरीर रचनालगभग चालीस
वंशपेंथेराइसके अतिरिक्त दहाड़ने की क्षमता और समान खोपड़ी संरचनागिनती की — बाघ, सिंह, तेंदुआ, जैगुआर
ध्यान दीजिए: अध्याय यह बात पेंथेरा के लिए सीधे कहता है — पेंथेरा टाइग्रिस (बाघ) और पेंथेरा लिओ (सिंह) इस वंश में इसलिए हैं क्योंकि ये गर्जना करने वाली बिल्लियाँ हैं, इनमें दहाड़ने की क्षमता है और इनकी खोपड़ी की संरचना समान है। इसकी तुलना कीजिए कि चमगादड़ और व्हेल में कितना कम साझा है, जबकि दोनों बाघ के साथ वर्ग मैमेलिया में हैं।
प्र13.
एक वैज्ञानिक एक नए जीव की खोज करता है जिसमें चलन की क्षमता तथा स्वपोषी पोषण का गुण पाया जाता है। पाँच जगत वर्गीकरण के अनुसार कौन-सी विशेषताएँ वैज्ञानिक को इस जीव को प्रोटिस्टा में रखने में सहायता करेंगी?
उत्तर

चलन और स्वपोषी पोषण मिलकर भी निर्णय नहीं करते। जो विशेषताएँ इसे प्रोटिस्टा में रखेंगी वे हैं — (1) यह एक अकेली कोशिका है, और (2) उस कोशिका में वास्तविक, झिल्ली आबद्ध केंद्रक है।

दिए गए दो लक्षण पर्याप्त क्यों नहीं:
  • केवल स्वपोषी पोषण प्लांटी की ओर संकेत करता है — परंतु पादप बहुकोशिकीय होते हैं और एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं जाते।
  • केवल चलन एनिमेलिया की ओर संकेत करता है — परंतु जंतु विषमपोषी होते हैं।
  • साइनोबैक्टीरिया भी स्वपोषी हैं, और वे मोनेरा में हैं।
अतः यह संयोजन एक पहेली है, और यह पहेली केवल चित्र 12.5 के सबसे ऊपरी दो प्रश्नों से हल होती है।
जाँचने योग्य लक्षणप्रोटिस्टा के लिए अपेक्षित परिणामयह किसे बाहर करता है
कोशिकाओं की संख्याएककोशिकीयप्लांटी, एनिमेलिया, फंजाई (सभी बहुकोशिकीय)
केंद्रकवास्तविक, झिल्ली आबद्धमोनेरा (पूर्वकेंद्रकी, आद्य केंद्रक)
कोशिका भित्तिअनुपस्थित, अथवा सेल्युलोस कीफंजाई (काइटिन भित्ति)
चलन की रचनाउसी एक कोशिका पर कशाभ, पक्ष्माभ या कूटपादचल प्रोटिस्ट होने की पुष्टि
पर्यावासजल या नम स्थानइस स्थान-निर्धारण का समर्थन
यह वर्णन जिस जीव पर बैठता है: यूग्लीना — एक अकेली सुकेंद्रकी कोशिका जो कशाभ से तैरती है और प्रकाश में प्रकाश संश्लेषण करती है। चित्र 12.5 में यूग्लीना और क्लैमाइडोमोनास दोनों प्रोटिस्ट के रूप में नामित हैं, और "जंतु की भाँति चलता है, पादप की भाँति भोजन बनाता है" वाला यही संयोजन वह कारण है जिससे प्रोटिस्टा को तीसरे जगत के रूप में बनाना पड़ा था।
प्र14.
एक शोधकर्ता ने एक एककोशिकीय सुकेंद्रकी जीव की पहचान कवक के रूप में की है। पाँच जगत वर्गीकरण के अनुसार किसी एककोशिकीय जीव को जगत फंजाई में रखने के लिए आप कौन-सी पहचान कुंजी को सुझाएँगे?
उत्तर

कुंजी है कोशिका भित्ति: वह काइटिन की बनी होनी चाहिए। यही एक लक्षण फंजाई की सामान्य "बहुकोशिकीय" शर्त पर भारी पड़ता है — और अध्याय यीस्ट के लिए ठीक यही तर्क देता है: "यद्यपि यीस्ट एककोशिकीय जीव होते हैं किंतु इसकी कोशिका भित्ति काइटिन की बनी होने के कारण इसे जगत फंजाई के अंतर्गत रखा गया है।"

सुझाई गई पहचान कुंजी

चरणप्रश्नयदि हाँयदि नहीं
1क्या वास्तविक, झिल्ली आबद्ध केंद्रक है?चरण 2 पर जाइएजगत मोनेरा — रुक जाइए
2क्या कोशिका भित्ति उपस्थित है?चरण 3 पर जाइएजगत प्रोटिस्टा (एककोशिकीय, भित्ति रहित)
3क्या भित्ति काइटिन की है?चरण 4 पर जाइएसेल्युलोस भित्ति → प्रोटिस्टा (एककोशिकीय) या प्लांटी (बहुकोशिकीय)
4क्या पोषण अवशोषण द्वारा विषमपोषी है — पर्णहरित नहीं, मृत या जीवित कार्बनिक पदार्थ पर वृद्धि?चरण 5 पर जाइएप्रकाश संश्लेषी → फंजाई नहीं
5क्या यह मुकुलन या बीजाणुओं द्वारा जनन करता है और गर्म-नम परिस्थितियों में भली-भाँति बढ़ता है?जगत फंजाई (एककोशिकीय सदस्य, जैसे यीस्ट)पुनः परीक्षण कीजिए
काइटिन ही निर्णायक लक्षण क्यों है: कोशिका भित्ति किस पदार्थ से बनी है, यह जीव की जैवरसायनिकी से तय होता है और वंशागत होता है — यह परिस्थितियों से बदलता नहीं। काइटिन की भित्ति कवक वंशक्रम का साझा, व्युत्पन्न लक्षण है; सेल्युलोस की भित्ति पादप वंशक्रम का। अतः वंशक्रम के लिए काइटिन, कोशिकाओं की संख्या से कहीं अधिक विश्वसनीय संकेतक है, क्योंकि कोशिकाओं की संख्या घट-बढ़ सकती है। यीस्ट को समझने का सही तरीका यह है कि वह ऐसा कवक है जो एककोशिकीय हो गया, न कि ऐसा प्रोटिस्ट जो कवक जैसा दिखता है।
शोधकर्ता जो अन्य प्रमाण भी जुटाएगा: पर्णहरित और प्रकाश संश्लेषण की पूर्ण अनुपस्थिति; कणों को निगलने के स्थान पर अवशोषण से पोषण; मंड के स्थान पर ग्लाइकोजन का संचय; और निर्णायक रूप से, ज्ञात कवकों से डीएनए तुलना।
प्र15.
एक दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय अध्ययन के दौरान विद्यार्थियों ने तीन अलग-अलग पर्यावरणों — एक अलवणीय जल के तालाब, सड़ी-गली लकड़ियों के आस-पास की नमी युक्त मिट्टी तथा जंतुओं के पाचन तंत्र से एकत्रित किए गए जीवों का परीक्षण किया। वैज्ञानिकों ने जीवों का प्रत्यक्षतः नामकरण करने के स्थान पर केवल उनकी संरचनात्मक, कोशिकीय तथा पोषण संबंधी विशेषताओं को नीचे दी गई तालिका के अनुसार अभिलेखित किया। P — सूक्ष्मदर्शीय, वास्तविक केंद्रक अनुपस्थित, दृढ़ कोशिका आवरण, उच्च लवणता और तापमान में जीवित रहता है। Q — बहुकोशिकीय, तंतुमय काया, कोशिका भित्ति उपस्थित, पर्णहरित अनुपस्थित, मृत कार्बनिक पदार्थ पर वृद्धि करता है। R — एककोशिकीय, वास्तविक केंद्रक उपस्थित, संकुचनशील धानी उपस्थित, कशाभ द्वारा गति करता है, प्रकाश की उपस्थिति में प्रकाश-संश्लेषण करता है और प्रकाश की अनुपस्थिति में विषमपोषी बन जाता है। S — बहुकोशिकीय, सुविभेदित ऊतक, मेरुदंड उपस्थित; जीवन की प्रारंभिक अवस्था में जलीय श्वसन। T — अकोशिकीय, आनुवंशिक पदार्थ उपस्थित, परपोषी कोशिका के बाहर निष्क्रिय रहता है। विद्यार्थियों ने यह अनुभव किया कि कुछ जीवों को व्हिटेकर के पाँच जगत वर्गीकरण के अंतर्गत स्पष्ट रूप से रखा जा सकता है, जबकि कुछ इस वर्गीकरण की मूल अवधारणा को चुनौती देते हैं। उपर्युक्त अध्ययन के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए — (i) किसी एक ऐसे जीव की पहचान कीजिए जो स्पष्ट रूप से जगत फंजाई में सम्मिलित हो। अपने उत्तर के समर्थन में एक अवलोकन लिखिए। (ii) कौन-सा जीव जगत मोनेरा में सम्मिलित किया जाएगा? इस वर्गीकरण को संगत पूर्ण ठहराने वाली एक विशेषता लिखिए। (iii) जीव ‘R’ और ‘Q’ दोनों सुकेंद्रकी हैं तब भी इन्हें अलग-अलग जगतों में सम्मिलित किया गया है। उन मानदंडों का विश्लेषण कीजिए जो इन्हें अलग करते हैं। (iv) समझाइए कि जीव ‘S’ का वर्गीकरण केवल पोषण की विधि के आधार पर क्यों नहीं किया जा सकता। (v) जीव ‘T’ पाँचों जगतों में से किसी में भी नहीं रखा जा सकता है। वर्गीकरण में प्रयुक्त कौन-सी मूलभूत विशेषता इसमें नहीं है और इससे वर्गीकरण प्रणालियों की कमियों के विषय में क्या पता चलता है? (vi) यदि वर्गीकरण केवल पर्यावास के आधार पर किया गया होता तो किन जीवों को अयथार्थ रूप से एक साथ समूहित किया जा सकता था? ऐसे वर्गीकरण के वैज्ञानिक परिणामों की व्याख्या कीजिए। (vii) कल्पना कीजिए कि वैज्ञानिकों ने एक ऐसे नए जीव की खोज की है जो बहुकोशिकीय तथा सुकेंद्रकी है। उसमें पर्णहरित नहीं है और वह बाहर से किसी परपोषी से पोषक तत्व अवशोषित करता है। बताइए इसे फंजाई या एनीमेलिया में से किस जगत में सम्मिलित किया जाना चाहिए? वर्गीकरण के मानदंडों के आधार पर अपने तर्क को उचित ठहराइए।
उत्तर

पहले पाँचों जीवों को स्थान दीजिए, फिर हर भाग का उत्तर।

जीवमुख्य अवलोकनजगतसंभावित पहचान
Pसूक्ष्मदर्शीय; वास्तविक केंद्रक अनुपस्थित; दृढ़ कोशिका आवरण; उच्च लवणता और तापमान में जीवितमोनेराआर्किया / चरमपोषी जीवाणु
Qबहुकोशिकीय; तंतुमय; कोशिका भित्ति उपस्थित; पर्णहरित अनुपस्थित; मृत कार्बनिक पदार्थ पर वृद्धिफंजाईमृतपोषी फफूँद, जैसे ऐस्पर्जिलस
Rएककोशिकीय; वास्तविक केंद्रक; संकुचनशील धानी; कशाभ से गति; प्रकाश में प्रकाश संश्लेषण, अंधकार में विषमपोषीप्रोटिस्टायूग्लीना
Sबहुकोशिकीय; सुविभेदित ऊतक; मेरुदंड उपस्थित; प्रारंभिक अवस्था में जलीय श्वसनएनिमेलिया — कशेरुकीउभयचर (टैडपोल क्लोम से श्वास लेता है)
Tअकोशिकीय; आनुवंशिक पदार्थ उपस्थित; परपोषी कोशिका के बाहर निष्क्रियपाँचों में से कोई नहींविषाणु

(i) कौन-सा जीव स्पष्ट रूप से जगत फंजाई में है, और समर्थन में एक अवलोकन

जीव Q। समर्थक अवलोकन: इसमें कोशिका भित्ति है परंतु पर्णहरित नहीं और यह मृत कार्बनिक पदार्थ पर वृद्धि करता है — अर्थात मृतपोषी, अवशोषण द्वारा पोषण। कोशिका भित्ति युक्त बहुकोशिकीय जीव या तो प्लांटी होगा या फंजाई; पर्णहरित का अभाव प्लांटी को बाहर कर देता है। तंतुमय काया भी अनुभाग 12.6.3 में वर्णित कवक जाल से मेल खाती है।

(ii) कौन-सा जीव जगत मोनेरा में जाएगा, और संगत ठहराने वाली विशेषता

जीव P। संगत ठहराने वाली विशेषता: इसमें वास्तविक केंद्रक नहीं है — यह पूर्वकेंद्रकी है, और चित्र 12.5 के पहले ही विभाजन के अनुसार पूर्वकेंद्रकी जीव मोनेरा हैं। उच्च लवणता और तापमान में इसका जीवित रहना भी इसी से मेल खाता है, क्योंकि जीवाणु और आर्किया उष्ण स्रोतों तथा अन्य चरम परिस्थितियों में पाए जाते हैं जहाँ अधिकांश जीव जीवित नहीं रह सकते।

(iii) R और Q को अलग करने वाले मानदंड, जबकि दोनों सुकेंद्रकी हैं

मानदंडR (प्रोटिस्टा)Q (फंजाई)
संगठन का स्तरएककोशिकीयबहुकोशिकीय, तंतुमय
कोशिका भित्तिउल्लेख नहीं; हो तो सेल्युलोस कीउपस्थित — काइटिन की
पोषण की विधिप्रकाश में स्वपोषी, अंधकार में विषमपोषीसदा विषमपोषी, मृत कार्बनिक पदार्थ से अवशोषण द्वारा
पारिस्थितिकीय भूमिकाउत्पादक और उपभोक्ताअपघटक
चलनकशाभ से तैरता है; अतिरिक्त जल निकालने के लिए संकुचनशील धानीअचल; आधार में फैलकर बढ़ता है

सुकेंद्रकी होना केवल यह बताता है कि चित्र 12.5 की कौन-सी शाखा लेनी है। संगठन का स्तर इन्हें तुरंत अलग कर देता है, और पोषण की विधि तथा भित्ति का पदार्थ इसकी पुष्टि करते हैं।

(iv) S का वर्गीकरण केवल पोषण की विधि से क्यों नहीं हो सकता

क्योंकि "विषमपोषी" पाँच में से तीन जगतों में साझा है — एनिमेलिया, फंजाई तथा अनेक प्रोटिस्टा और मोनेरा। यह जान लेने से कि S भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर है, संभावनाएँ लगभग घटती ही नहीं। S को वास्तव में उसकी संरचना रखती है: सुविभेदित ऊतकों सहित बहुकोशिकीय (अतः प्रोटिस्टा या मोनेरा नहीं), वास्तविक ऊतक और अंग सहित तथा कोशिका भित्ति का कोई संकेत नहीं (अतः फंजाई नहीं, जो कवक जाल से अवशोषण करते हैं), और सबसे बढ़कर मेरुदंड — जो इसे केवल एनिमेलिया में नहीं, कशेरुकी वर्ग में रखता है। जीवन की प्रारंभिक अवस्था में जलीय श्वसन इसे और सँकरा करके उभयचर तक ले जाता है। अकेले प्रयुक्त पोषण एक कमज़ोर लक्षण है; यहाँ सूचना संरचना में है।

(v) T में कौन-सी मूलभूत विशेषता नहीं है और इससे क्या पता चलता है

T में कोशिकीय संगठन नहीं है। यह अकोशिकीय है — कोशिका झिल्ली, कोशिकाद्रव्य, कोशिकांग और किसी भी उपापचय के बिना केवल आनुवंशिक पदार्थ, और परपोषी के बाहर निष्क्रिय। पाँच जगत प्रणाली का हर मानदंड (कोशिका प्रकार, संगठन का स्तर, कोशिका संरचना, पोषण की विधि, पारिस्थितिकीय भूमिका) कोशिकाओं के विषय में प्रश्न है, अतः इनमें से एक भी T से पूछा ही नहीं जा सकता।

इससे क्या पता चलता है: कोई भी वर्गीकरण प्रणाली उतना ही छाँट सकती है जितना उसके मानदंड माप सकते हैं। प्रकृति सतत है और सीमावर्ती उदाहरण पैदा करती रहती है; डिब्बों से बनी प्रणाली में कुछ न कुछ सदा किसी रेखा पर बैठा रहेगा। ऐसे बेमेल लज्जा का कारण नहीं हैं — इतिहास में हर बेमेल ने प्रणाली को आगे बढ़ाया है (अमीबा → प्रोटिस्टा, जीवाणु → मोनेरा, कवक → अपना जगत, डीएनए आँकड़े → तीन डोमेन)। वर्गीकरण एक कार्यसाधक उपकरण है जिसे प्रमाण बढ़ने पर संशोधित किया जाता है, प्रकृति के विषय में अंतिम कथन नहीं।

(vi) यदि वर्गीकरण केवल पर्यावास के आधार पर होता

तब जीव इस आधार पर समूहित होते कि वे कहाँ रहते हैं, न कि इस आधार पर कि वे हैं क्या। इसी अध्ययन से —

  • R (एक प्रोटिस्ट) और S (एक कशेरुकी) एक साथ आ जाते क्योंकि दोनों अलवणीय जल के तालाब से एकत्र किए गए थे — एक अकेली सुकेंद्रकी कोशिका मेरुदंड वाले जंतु के साथ।
  • P और T दोनों "जंतुओं के पाचन तंत्र में पाए गए" के रूप में एक समूह में रखे जा सकते थे, अर्थात एक जीवित पूर्वकेंद्रकी जीव एक निर्जीव विषाणु के साथ।
  • Q (सड़ी लकड़ियों के पास की नम मिट्टी) उसी मिट्टी में मिलने वाले केंचुओं, कीटों और मॉस के साथ समूहित होता, जबकि ये चार अलग-अलग जगतों के हैं।
वैज्ञानिक परिणाम:
  • असंबद्ध जीव संबंधी मान लिए जाते और निकट संबंधी अलग हो जाते — व्हेल मछलियों के साथ आ जाती और शेष स्तनधारियों से अलग हो जाती।
  • प्रणाली का पूर्वानुमान मूल्य समाप्त हो जाता। यह जान लेने से कि कोई जीव "जलीय" है, उसकी कोशिकाओं, पोषण या जनन के विषय में कुछ भी पता नहीं चलता।
  • जीव के स्थान बदलते ही वर्गीकरण टूट जाता। मेंढक टैडपोल अवस्था में जलीय और वयस्क अवस्था में स्थलीय है; प्रवासी पक्षी वर्ष में दो बार समूह बदलता।
  • विकासात्मक सूचना नष्ट हो जाती — जबकि वर्गीकरण का पूरा उद्देश्य ही यह दिखाना है कि जीव आपस में किस प्रकार संबंधित हैं।
इसीलिए अरस्तू की पर्यावास आधारित प्रणाली, जिसने जीवों को भूमि, जल और वायु के अनुसार समूहित किया था, छोड़नी पड़ी: वह मुख्यतः सरलता से दिखाई देने वाली बाहरी विशेषताओं पर आधारित थी

(vii) नया जीव — फंजाई या एनिमेलिया?

इसे फंजाई में रखना चाहिए। जीव बहुकोशिकीय और सुकेंद्रकी है, उसमें पर्णहरित नहीं है और वह बाहर से किसी परपोषी से पोषक तत्व अवशोषित करता है

मानदंडजीव में क्या हैयह किस ओर संकेत करता है
कोशिका का प्रकारसुकेंद्रकीमोनेरा नहीं
संगठन का स्तरबहुकोशिकीयप्रोटिस्टा नहीं
पर्णहरित / पोषणअनुपस्थित; विषमपोषीप्लांटी नहीं
पोषण किस प्रकार लेता हैबाहर से पोषक तत्व अवशोषित करता हैफंजाई — जंतु भोजन को शरीर के भीतर लेकर वहीं पचाते हैं
निर्णायक तर्क: केवल विषमपोषिता फंजाई और एनिमेलिया को अलग नहीं कर सकती — दोनों भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर हैं। अंतर विधि का है। कवक शरीर के बाहर पाचन करके महीन तंतुओं से उत्पाद अवशोषित करते हैं; अध्याय यह सीधे कहता है और यह भी जोड़ता है कि कुछ कवक परजीवी के रूप में रहते हैं और पादपों तथा जंतुओं में रोग उत्पन्न करते हैं — ठीक वही जीवन शैली जो यहाँ वर्णित है। जंतु भोजन को पहले शरीर के भीतर लेते हैं। अतः बाह्य अवशोषण इसे फंजाई में रखता है।
पुष्टि के लिए और क्या देखा जाए: काइटिन की कोशिका भित्ति और तंतुमय कवक जाल मिलते ही निर्णय निर्विवाद हो जाएगा, क्योंकि जंतु कोशिका में कोई कोशिका भित्ति होती ही नहीं। यदि पता चले कि जीव में कोशिका भित्ति नहीं है और वह घुले पोषक अवशोषित करने के बजाय ऊतक निगलता है, तो उत्तर पलटकर एनिमेलिया हो जाएगा — जैसे परजीवी चपटा कृमि अंकुश और चूषक से परपोषी से जुड़कर पोषण लेता है, परंतु है वह जंतु ही।
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