प्र1.
एक कोशिकीय जीव अपने सभी जैव-प्रक्रम किस प्रकार करते हैं जबकि हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवों में समान कार्य करने के लिए अरबों कोशिकाओं की आवश्यकता होती है?
उत्तर
क्योंकि एक अकेली कोशिका इतनी छोटी होती है कि उसे अंगों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती — वह सब कुछ अपनी सतह से विसरण द्वारा और भीतर के कोशिकांगों को लघु अंगों की भाँति उपयोग करके कर लेती है। हमारी अरबों कोशिकाएँ ये कार्य करने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए चाहिए क्योंकि हम बड़े हैं।
तंत्र — पृष्ठीय क्षेत्रफल और आयतन का अनुपात। हर कोशिका ऑक्सीजन, भोजन और अपशिष्ट का आदान-प्रदान अपनी सतह से करती है, परंतु इनका उपयोग पूरे आयतन में होता है। शरीर बड़ा होने पर आयतन, पृष्ठीय क्षेत्रफल की तुलना में कहीं तेज़ी से बढ़ता है, अतः सतह भीतरी भाग को पूर्ति देने के लिए बहुत छोटी पड़ जाती है।
त्रिज्या r के गोले के लिए —
पृष्ठीय क्षेत्रफल = 4πr2 आयतन = (4/3)πr3
पृष्ठीय क्षेत्रफल / आयतन = 3 / r
अर्थात r दुगुना करने पर प्रति इकाई आयतन पृष्ठीय क्षेत्रफल आधा रह जाता है।
अमीबा मिलीमीटर के कुछ सौवें भाग जितना है, अतः उसका यह अनुपात बहुत बड़ा है। सतह से भीतर विसरित होती ऑक्सीजन उसके हर भाग तक क्षण भर में पहुँच जाती है। मनुष्य लगभग 1.7 m ऊँचा है — इतनी दूरी विसरण से तय करने में ऑक्सीजन को वर्षों लगेंगे, इसलिए हमें फेफड़े, रुधिर, हृदय और वाहिकाएँ रखनी ही पड़ती हैं।पृष्ठीय क्षेत्रफल = 4πr2 आयतन = (4/3)πr3
पृष्ठीय क्षेत्रफल / आयतन = 3 / r
अर्थात r दुगुना करने पर प्रति इकाई आयतन पृष्ठीय क्षेत्रफल आधा रह जाता है।
एक कोशिका के भीतर कार्य कौन करता है:
| जैव प्रक्रम | प्रोटिस्ट में (एक कोशिका) | हममें (अंग तंत्र) |
|---|---|---|
| भोजन ग्रहण | कूटपाद घेर लेते हैं, या पक्ष्माभ मुख खाँच में बुहार देते हैं | मुख, आमाशय, आँत |
| पाचन | एंजाइम युक्त खाद्य धानी | पाचक ग्रंथियाँ और आहार नाल |
| गैसों का आदान-प्रदान | सीधे कोशिका झिल्ली से | फेफड़े और रुधिर |
| अतिरिक्त जल का निष्कासन | संकुचनशील धानी बाहर पंप कर देती है | वृक्क |
| गति | कूटपाद, पक्ष्माभ या कशाभ | पेशियाँ और कंकाल |
| ऊर्जा मुक्ति | माइटोकॉन्ड्रिया | माइटोकॉन्ड्रिया — हमारी हर कोशिका में भी |
निष्कर्ष: बहुकोशिकता कोशिका की क्षमता में सुधार नहीं है — यह बड़े होने की कीमत है। जीव जैसे ही विसरण की पहुँच से बड़ा होता है, उसे कार्य को विशेषीकृत कोशिकाओं, ऊतकों और अंगों में बाँटना ही पड़ता है। यही कहानी इस अध्याय में जंतु जगत भी सुनाता है — स्पंज (कोशिकीय स्तर) से लेकर अंग तंत्र तक।